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पहिले दशहरा घरी से ही आदमी साल सूटर निकाल लेता था, बक्सा मे से. कम से कम हाफ वाला तो पहिन ओढ़ के मेला पंडाल घूमने जाता ही था. संदूक से निकला कपड़ा साल में से जो फिनाइल का सुगंध आता था न, कि एकदम यादों का पिटारा खुल जाता था. आदमी सालों पीछे घूम कर आ जाता था. इसीलिए इस गंध को कई बार प्रेम के कवि लोग पुराने प्यार के अहसान से तुलना कर देता है. अरे बात हो रहा है जाड़ा का तो प्रेम? कैसे नहीं आएगा इश्क का बात! 'माफ़लर और हाफ स्वेटर महबूब के हाथो बिना हुआ' ये लाइन भले ही बहुत काल्पनिक और cliche लगे, लेकिन इसका रूमानी अहसान एकदम रियल जैसा लगता है, सीधा करेजा मे उतर जाता है, रोम रोम में रोमांस उभरने लगता है.
अच्छा! प्रेम का पर्यावाची शब्द है ममता. तो आपलोग के पास भी माँ चाची मौसी का बिना हुआ स्वेटर होगा ही. वही जो कभी पुरान ही नहीं होता है, एक भाई से दूसरा जगह ट्रांसफर होता था खाली साइज के हिसाब से. थोड़ा मोड़ फूदरुसी तो कोई ध्यान भी नहीं देता था. डबल कांटा का बिना हुआ स्वेटर में तो सुन्दर सुन्दर डिजाइन भी रहता था. कोनो कोनो मे नाम भी लिखा रहता था. मजेदार बात ये कि स्वेटर का उन रीसाइकल भी होता था, उघार के उन फिर से नया डिजाइन का स्वेटर बन जाता था. ढेरे याद जुड़ा हुआ है जी इस बात से! फेरी वाला से उन खरीदना, नया नया डिजाइन का बुनाई देखते दीदी लोग का उलट पलट के स्वेटर को देखना, नया डिजाइन गाँव में आते ही गहमागहमी से उसका चर्चा हो जाना गाँव भर के लेडीज लोग में, मास्टरनी मेम लोग का स्कूल में भी स्वेटर बुनना विद्यार्थियों को टास्क धरा के, बियाह के लिए एक अनिवार्य योग्यता का पूछा जाना कि लड़की को बुनाई कढाई आता है कि नहीं!
खैर! पर्यावरण बदल रहा है. एक समय सितंबर के धूप को प्यार का पहला अहसान बताते थे गुलजार सहाब अपनी नज़्मों में, और आज दिसम्बर में भी कहीं कहीं पंखा चला कि सोना पड़ता है. तब भी, तनी मानी जाड़ा तो शुरू हो ही गया है. खोलीए संदूक के साथ यादों की गठरी और बताइए अपना संस्मरण...
अच्छा बच्चा लोग! मां बाबुजी का बात मान लो. फूटानी छोड़ के साल स्वेटर पहन लो अब.
© Awanish Prakash

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