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जब तक जीवन है तो स्वाद ही सत्य है। कहीं सुना भी था कि - "दीवाने सिर्फ इश्क के ही नहीं होते, स्वाद के भी होते हैं।"स्वाद की बात हो तो देशी मिठाइयों की एक लम्बी श्रृंखला है। जिसमें 'गुड़हिया जलेबी' का नाम महत्वपूर्ण है।
वैसे डाल्टनगंज में जलेबी की जगह '#जलेबा' का ज्यादा प्रचलन है। फिर भी कुछ खुशकिस्मत लोगों ने पलामू के गाँव-देहात में लगने वाले बाजार-मेलों में गुड़हिया जलेबी के स्वाद को अवश्य चखा होगा। जो भी इसे चखता है ,उसे इस अद्भुत स्वाद से मोहब्बत हो जाती है और फिर जीवन भर इसकी तारीफ करने में डूबा रहता है।
टप-टप, टपकते हुए गुड़ के गाढ़े पाग (चाशनी) में डूबी यह गरम-गरम जलेबी, जिसका कुरकुरापन और मिठास उस असीम आनंद का बोध कराता है, जिसे शास्त्रों में परम आनंद की संज्ञा दी गयी है। सिर्फ स्वाद की दृष्टि में ही नहीं बल्कि पारंपरिक चिकित्सकों का यह मानना है कि इसे खाने से सर्दी जुकाम और खांसी में भी बहुत फायदा मिलता है।
नगरों -महानगरों की चकाचौंध में पारम्परिक ग्रामीण स्वाद वाली 'गुड़हिया जलेबी' भले विलुप्त मिष्ठानों में शामिल है लेकिन गाँव -देहात के नुक्कड़ और साप्ताहिक हाट-मेलों में अक्टूबर से मार्च तक के महीने में इसकी जोरदार आमद होती है क्योंकि इस समय गन्ने का ताजा रस और नया गुड़ मिलता है। फिर यह अपने शौकीनों की जीभ से होते हुए उनके पेट तक को तर कर देता है।
आप में बहुत सारे लोगों ने इस विशुद्ध देसी 'गुड़हिया जलेबी' को अवश्य चखा होगा। कुछ लोग इस पोस्ट को पढ़ने के बाद इसकी खोज में लग जाएंगे कि कैसे स्वाद के इस परमानंद की प्राप्ति करें? सम्माननीय पाठकों से निवेदन है किआपके आसपास इस देसी स्वाद की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी हो तो हम सभी से अवश्य साझा करें।
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© अजय शुक्ला

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