----------------------------------------------
आजादी के दीवानों के गढ़ बेलवाटिका में रहने वाले नंदकिशोर प्रसाद वर्मा (नंदा बाबू) 1942 की क्रांति के वक्त 23 साल के युवा थे। अंग्रेजों के खिलाफ उनके मन में काफी गुस्सा था। नंदा बाबू के बड़े भाई गणेश प्रसाद वर्मा पलामू के कांतिकारियों के अग्रणी नेता थे। इसका असर यह हुआ कि वह भी आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और जेल भी गए। मजबूत कदकाठी और रौबदार व्यक्तित्व वाले नंदा बाबू लाठी भांजने यानी गदका में भी निपुण थे। रामनवमी के दौरान जब वे दोनों हाथों से गदका भांजते थे तो लोग एकटक होकर उनकी इस कला को सम्मोहित होकर देखते थे।
एक ओर अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की आग उनके दिल में धधकती थी तो दूसरी ओर वह समाज में शांति के भी उतने ही पक्षधर थे। उनकी कदकाठी से अंग्रेज विचलित होते थे तो शहरवासी उनके साथ हो जाते थे। यही कारण है कि 1947 में रामनवमी के दौरान उन्हें डालटनगंज में शांति की कमान सौंपी गई थी। नंदा बाबू के भतीजे सत्यपाल वर्मा (अब स्वर्गीय) के अनुसार, 'वर्ष 1947 में जब भारत को आजाद घोषित करने की बस औपचारिकताएं बची थी। इस बीच देश के दूसरे हिस्सों में विभाजन को लेकर सांप्रादायिक दंगे भी शुरू हो गए। हालांकि पलामू इन दंगों से अभी अछूता था। तत्कालीन उपायुक्त एसजी जिलानी को गुप्त सूचना मिली थी कि देश में सांप्रदायिक दंगों की आग की लपटें पलामू तक पहुंच सकती हैं।
सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका से चिंतित उपायुक्त ने जिले के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों यदुवंश सहाय, गणेश प्रसाद वर्मा व गौरीशंकर ओझा से सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की। इस क्रम में उऩ्हें बताया गया कि लाल पगड़ी वाले पुलिसकर्मियों को तैनात करने भय का वातावरण बन सकता है। इस पर गणेश वर्मा ने सभी स्वतंत्रता सेनानियों का एक पीस बिग्रेड के गठन करने का सुझाव दिया। इसमें शामिल लोग रामनवमी व मुहर्रम के अवसर पर शहर में शांति व्यवस्था कायम रखने का काम करेंगे।' सत्यपाल वर्मा के अनुसार, 'उपायुक्त ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए अगले दिन ही जिले के स्वतंत्रता सेनानियों को अपने आवासीय परिसर में आमंत्रित किया। इसमें पुलिस विभाग के आला अफसर भी बुलाए गए थे। उस समय 30 स्वतंत्रता सेनानियों के साथ 'पीस बिग्रेड' की स्थापना की गई थी। लंबी और मजबूत कद काठी के कारण नंद किशोर वर्मा और रोबिन रिचर्ड को बिग्रेड का प्रभारी बनाया गया। सभी स्वतंत्रता सेनानियों को उपायुक्त स्तर से सफेद शर्ट व सफेद फूलपैंट के साथ एक हंटर दिया गया। इनके सहयोग से पलामू में रामनवमी का त्योहार शांतिपूर्वक संपंन्न हुआ। देश की आजादी 75 वर्षों के बाद भी यह परंपरा अभी भी कायम है, हालांकि इसका स्वरूप बदल शांति समिति हो गया है। लेकिन पीस बिग्रेड की परिकल्पना को साकार करने में नंदा बाबू की भूमिका अमर हो गई।'
जब मैंने गणेश प्रसाद वर्मा पर लिखने के दौरान सत्यपाल वर्मा जी से चर्चा की थी तो उन्होंने कहा था, 'यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं स्वतंत्रता सेनानी का पुत्र, स्वतंत्रता सेनानी का भतीजा और स्वतंत्रता सेनानी (गोकुल नाथ वर्मा) का भगीना हूं। बाबूजी की प्रेरणा से नंदा चाचा 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। 8 अगस्त 1942 को प्रधान डाकघर लूट कांड में शामिल होकर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया था। यहां से लूटे गए पैसे को भूमिगत आंदोलन में लगाने की योजना थी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इनको अन्य सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था। डाकघर लूटकांड में कृष्ण नंदन सहाय 'बच्चन बाबू', गंगा प्रसाद वर्मा, बासुदेव प्रसाद, गोकुल नाथ वर्मा, रोबिन रिचर्ड, जमुना प्रसाद, महावीर सिंह, शिव सिंह सहित 15 से 30 युवाओं की अग्रणी भूमिका रही थी। बेलवाटिका में राजेश्वर अग्रवाल, पूरन चंद, महावीर वर्मा, नगुना राम, इंद्रदेव सिंह, महताब सिंह, राम जन्म सिंह, तीरथ प्रकाश भसीन, वेद प्रकाश भसीन सरीखे आजादी के मतवालों का जमावड़ा लगा रहता था। ये सभी भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए कटिबद्ध थे।'
नंदा बाबू की पौत्रवधू शर्मिला शुमि अपने दादा ससुर को याद कर काफी भावुक हो जाती हैं। वह खुद तो कभी नंदा बाबू से नहीं मिली पर उऩ्होंने घर में उनके संघर्ष और जीवटता की चर्चा काफी सुन रखी है। इन्हीं बातों को याद कर वह कहती हैं, 'स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों को चकमा देने के लिए नंदा बाबू ने कभी अखबार बेचा तो कभी मुहल्ले की पहरेदारी की। बेलवाटिका के बाकी स्वतंत्रता सेनानियों ने पारी बांट रखी थी कि एक दिन एक व्यक्ति पहरा देगा तो दूसरे दिन दूसरा व्यक्ति। ऐसा करने का मकसद अंग्रेज पुलिस पर नजर से खुद बचना और दूसरों को बचाना भी था। वह काफी समय भूमिगत भी रहे थे। जब उनके सबसे बड़े पुत्र भगवान प्रसाद वर्मा गर्भ में थे तब अंग्रेजी पुलिस इनकी पत्नी की पेट में डंडे घोंपकर इनके छुपने की जगह पूछती थी। बाद में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें जेल में ही बड़े पुत्र के जन्म की सूचना मिली थी। जेल से जब रिहा होकर आए तो इनकी पत्नी गुलाब देवी अपने मायके में थीं। इसका कारण यह था कि अंग्रेज उन्हें भी क्रांति में शामिल लोगों की सहयोगी मानती थे।'
जेल से रिहा होने के बाद बेलवाटिका चौक स्थित आवास छोड़कर कांदु मुहल्ले ( गुरुद्वारा के पीछे) में इन्होंने घर खरीदा और सपरिवार रहने लगे। यहीं विश्वनाथ वर्मा, सोमनाथ वर्मा, गीता देवी, रीता सिन्हा, गायत्री देवी और अनिता सिन्हा का जन्म हुआ। नंदा बाबू की कुल सात संतानें थीं जिनमें अब मात्र तीन जीवित हैं। देश की आजादी के बाद नंदा बाबू ने भारतीय रेलवे में अपनी सेवाएं दी थी। वे यहां माल बाबू के पद पर कार्यरत थे। वह मुंशी कृपानारायण लाल की तीसरी संतान थे। उनका जन्म 4 जुलाई 1919 को हुआ था। उन्होंने 13 जुलाई 1981 को आखिरी सांस ली थी।
रामनवमी के मौके पर नंदा बाबू के योगदान को याद करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है।
© प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ट पत्रकार, अमर उजाला नोएडा

No comments:
Post a Comment