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पलामू जिला स्कूल में हमलोगों के शिक्षक थे कुंवर कामेश्वर प्रसाद सिंह। हर साल 23 अप्रैल को कुंवर सिंह विजयोत्सव के मौके पर वह स्कूल में समारोह का आयोजन करते थे। उनकी बात शुरू होती थी मनोरंजन प्रसाद सिंह की प्रसिद्ध कविता की इन पंक्तियों से-
"मस्ती की थी छिड़ी रागिनी, आजादी का गाना था।
उधर खड़ी थी लक्ष्मीबाई, और पेशवा नाना था।
इधर बिहारी वीर बाँकुरा, खड़ा हुआ मस्ताना था ॥
अस्सी वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था।
सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था॥"
ये पंक्तियां हम बच्चों में जोश भर देतीं थी। अपने पूर्वज की गाथा सुनाते हुए कुंवर बाबू काफी आक्रामक और भावुक हो जाते थे। उनके हाथ की 'बंकुली' 'तलवार' की तरह चलने लगती थी और फिर उनकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ती थी। बाद में हमलोगों ने आगे के क्लास में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ा तो इसमें 1857 के आंदोलन को 'सिपाही विद्रोह' के रूप में बताया गया। फिर पता चला कि यह विद्रोह नहीं बल्कि क्रांति थी। इसे वीर सावरकर के नाम से जाने जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने '1857 का स्वातंत्र्य समर' कहा और इसी नाम से पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में विजय दिवस के दिन का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है, '23 अप्रैल को अंग्रेजी सेना को ऐसी धोबी पछाड़ देकर उस वृद्ध युवा राजा कुंवर सिंह ने अपने जगदीशपुर के राजमहल में विजयश्री के साथ प्रवेश किया।'
इस पुस्तक में वीर सावरकर ने बाबू कुंवर सिंह के गंगा पार करने से लेकर राजमहल तक पहुंचने का जिस तरह से विवरण किया है वह उनकी वीरता की जीवंत तस्वीर खींचने के समान है। उन्होंने लिखा है, 'सारी सेना कुंवर सिंह ने पहले ही गंगा पार उतार दी थी और क्षण-दो क्षण में अपनी सेना को सुरक्षित नदी पार हुआ देखकर वह भी पार हो गया होता; परंतु हाय! हाय! एक क्षण ने कितना घात किया! भारत भूमि का वह सौभाग्य तिलक, वीरांगन का वह अभिमान, स्वतंत्रता की वह तलवार- राणा कुंवर सिंह! गंगा घाट में बीचोबीच पहुंच गया तब शत्रु की एक गोली आई और उसके एक हाथ में घुस गई। यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया? अश्रु बहाने लगा क्या? रक्त का बहाव रोकने के लिए किसी की सहायता मांगने लगा क्या? क्या उसका आसन उस तीव्र वेदना के किंचित भी विचलित हुआ? नहीं-नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ पर मक्खी बैठे, उतना भी कंपित नहीं हुआ। उसने एक बार उस गोली को तिरस्कार से देखा और कुंवर सिंह को मैंने एक क्षण भी अस्वस्थ किया, उस फिरंगी गोली को यह अभिमान भी न हो- ऐसा उसे लगा। उसने दूसरे हाथ से अपनी तलवार खीच ली और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ हाथ कुहनी से छांट दिया और यह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की- हे माता, हे गंगा! बालक का यह शेषोपहार स्वीकार कर। भागीरथी को हे माता, हे माता कहने वाले सैकड़ों पृथजन आज तक जनमे और जनमेंगे, पर कुंवर सिंह, तेरे कारण यह देवी जाह्नवी पुत्रवती हुई है।'
पुस्तक के इस हिस्से को पढ़ते समय एक बार फिर जिला स्कूल में पहुंच गया। हमलोगों के शिक्षक कुंवर बाबू ने 1979 या 80 में इस टाउन हॉल 'कुंवर सिंह' नाटक का मंचन टाउन हॉल में कराया था। इसमें विद्यासागर शर्मा ने कुंवर सिंह का जीवंत अभिनय किया था। उन्होंने करीब-करीब इसी अंदाज में मां गंगा को अपनी कुहनी के नीचे का हिस्सा अर्पित किया था।
वीर सावरकर आगे लिखते हैं, 'इस लोकोत्तर पुरुष द्वारा यह अलौकिक उपहार अपनी त्रिलोक विख्यात मातृगंगा को अर्पित करते ही उसकी शीतर फुहारों ने उसका देह सिंचन किया और इस मातृप्रेम से उत्साहित हो वह वीरवर अपनी सेना के साथ गंगा पार हो गया। उसका पीछा करती अंग्रेजी सेना हताश होकर गंगा के इस ओर ही कुंवर सिंह का नाम लेना छोड़कर बैठी हुई थी। तब वैर भाव से रहित हुआ वह सिंह शाहाबाद प्रांत के अपने जन्मसिद्ध जंगल में फिर एक बार घुसने लगा। 22 अप्रैल को उसने जगदीशपुर में भी प्रवेश किया और इस तरह जिस राजमंदिर से उसे कोई आठ माह पूर्व अंग्रेजों ने निकाल दिया था उसी जगदीशपुर के राजमहल में उसका अपना राजा फिर एक बार बिराजने लगा। कुंवर सिंह के गंगा उतरकर आते ही उसका समान वीर बंधु अमुर सिंह हजारों सशस्त्र ग्रामीणों के साथ आकर मिल गया। इन लोगों को और गंगा उतरकर आए शूर सिपाहियों को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के चारों ओर के जंगलों में निशाने-निशाने पर नियुक्त किया और छापामार युद्ध से विजयश्री पाया हुआ वह वीर रणपुरुष रण के लिए सज्जित होकर फिर से रण में उतरा।'
इसके बाद अंग्रेजी सेना और कुंवर सिंह की सेना में फिर जोरदार युद्ध हुआ। अंग्रेज सेना के पास तोपें थी पर कुंवर सिंह की सेना में देशप्रेम और आजादी की ललक थी। वीर सावरकर के शब्दों में,'झाड़ी में घुसते ही कुंवर के लोगों पर अंग्रेजी सेना गुर्राते हुए गोले छोड़ने लगी। कुंवर के पास तोपें तो थी नहीं, पर ऐसा होते हुए भी कुंवर की सेना अंग्रेजी सेना की तोपों की खिल्ली उड़ाकर उन्हें बांधना चाहती थी। फिर अब छोड़े अंतिम बाण! अंग्रेजी सेना ने जोरदार हमला करने का निश्चय किया। वे कालदूत की तरह कुंवर पर टूट पड़े, कुंवर की सेना झाड़ियों में से उनका सामना करने लगी। अरे! अंग्रेजी सेना की हिम्मत एकदम टूट गई, पीछे लौटने का बिगुल बज उठा। कुंवर ने अंग्रेजी सेना को ऐसी जगह और इस रीति से फांस लिया था कि वहां खड़ा रहना या वहां से भागना-ये दोनों समान रूप से घातक थे। इधर कुवंर सिंह के आदेश से उसके राजमहल का सारा महत्वपूर्ण सामान दूसरी जगह भेज दिया गया था। वैसे ही सरकार कागज आदि न जलाकर उसने सिपाहियों को कहा कि अंग्रेजों को यहां से भगा देने के बाद वास्तविक वसूली और न्याय करने के लिए ये कागज अवश्य रखे जाने चाहिए। लोगों का उसके प्रति इतना आदर था कि उसके सामने कोई धूम्रपान करने की हिम्मत नहीं करता था।'
पुस्तक में आगे लिखा गया है, 'श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है। सन 1857 के क्रांतियुद्ध में यदि कोई सब प्रकार से योग्य नेता था तो वह कुंवर सिंह ही था। युद्धकला में उसकी बराबरी कर सके ऐसा कोई नहीं था।' वीर सावरकर की पुस्तक का पहला संस्करण 1909 में आया था। उन्होंने उसी समय कुंवर सिंह को काव्य के नायक के रूप शोभित होने की बात लिखी थी। इसे 1929 में मनोरंजन प्रसाद सिंह ने 'वीर कुंवर सिंह' शीर्षक से कविता लिखकर सही साबित कर दिया। यह कविता इस साल रामबृक्ष बेनीपुरी के संपादन में निकलने वाली 'युवक' में छपी। जिस तरह वीर सावरकर की पुस्तक को अंग्रेजों ने प्रतिबंधित किया था उसी तरह इस कविता को भी प्रतिबंधित कर दिया। इस प्रतिबंध के बाद भी कुंवर सिंह की यश और कीर्ति को रोका नहीं जा सका। इस गीत के अलावा 'बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर' भी बिहार-झारखंड सहित पूर्वांचल में गाया जाने वाला सबसे प्रचलित गीतों में से है।
बाबू कुंवर सिंह की चर्चा करते हुए मुझे अपने कॉलेज के दिन भी याद आ रहे हैं। तब मैं छात्र राजनीति में भी था और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ जीएलए कॉलेज में कुंवर सिंह विजयोत्सव के मौके पर साइकिल रेस का आयोजन करता था। यह परंपरा वर्षों तक चली।
आइये, विजयोत्सव के मौके पर वीर बलिदानी बाबू कुंवर सिंह को याद करें।
नोट-विनायक दामोदर सावरकर ने यह पुस्तक कई दस्तावेजों के आधार पर लिखी है। कुंवर सिंह वाले अंश में उन्होंने रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति, बंगाल का जिक्र किया है।'
© प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा

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