आपका ध्यान बहुतेरे बार अजीब नाम वाले गांव, चौक, चौराहे पर पड़ा होगा। कुछ नाम अजीब होने के साथ ही बहुत रोचक भी होते हैं और उस नाम के पीछे की कहानी को जानने की उत्सुकता पैदा करते हैं।
आज मैं ऐसी ही एक चौक की कहानी लेकर आपके सामने आया हूँ। मैं बात कर रहा हूँ अपने गांव #पोलपोल के सुप्रसिद्ध चौक की। जिसका नाम अपने आप में बड़ा रोचक और अजीब है '#मोबाइल_चौक'।
इस चौक का नाम 'मोबाइल चौक' यूँ ही नहीं पड़ा था। बात उन दिनों की है जब हमारे यहाँ मोबाइल फ़ोन रखना स्टेटस सिंबल हुआ करता था। लैंडलाइन की विदाई धीरे-धीरे होने लगी थी और लोग अपने घरों में शौचालय बनवाने के बजाए हांथ में मोबाइल फ़ोन रखना स्टेटस सिंबल समझते थे। मोबाइल नेटवर्क के पीढ़ी,' 2G में G का मतलब क्या है?' - SSC में प्रश्न पूछा जाता था। लोग सामने वाले को फोन करके जोर से याद दिलाना नहीं भूलते थे कि मोबाइल फोन से फोन किये हैं। मोबाइल कम्पनियाँ भी एकाध टावर बना कर बस ज्यादा से ज्यादा सिम बेचने में लगी रहती थी। हम गांव के लोग भी कॉल करने से ज्यादा मिस्ड कॉल करने में विश्वास रखते थे और उसके बाद फोन पे नज़र गड़ा के बइठल रहते थे।
उस समय नोकिया के कीपैड वाले मोबाइल का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन नेटवर्क कमजोर होने के कारण घर मे अंदर आवाज़ अच्छे से नहीं आती थी और जैसे ही व्यक्ती मोबाइल लेके हैलो-हैलो करते चौक पे आता तो फिर बातों का संचार स्पष्ट रूप से बड़ी सरलता से हो जाता था। अब नेटवर्क की समस्या कहिये या मोबाइल चमकाने की खुजली। इलाज़ तो अपना मोबाइल चौक ही था।
एगो आउ बात है। बाद में जब नेटवर्क ठीक भी हो गया था लेकिन जवानी की दहलीज पर कदम रखते नव प्रेमी जानबूझकर नेटवर्क का बहाना कर के घर से निकल कर यहीं घंटों समाधि लगाते हुए पाए जाते। हालांकि वीडियो कॉल के बाद स्थिति में कुछ बदलाव जरूर हुआ है..
इसीलिये गांव के कुछ जिंदादिल बुद्धिजीवियों ने उस चौक का नाम मोबाइल चौक रख दिया और सड़क किनारे खड़ी बिजली के खंबे पर चौक से 'मोबाइल चौक' भी लिख दिया गया। उम्मीद है आप भी कुछ ऐसी ही रोचक नामों की कहानियों कमेन्ट में शेयर करेंगे।
©बालेन्दु शेखर

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