#ठेठ_पलामू स्थापना दिवस विशेष
" आज दोपहर को सत्तू खाएँगे।सतुआनी पर्व है आज।आज रात की बनी हुई चीजें कल खाएँगे।कल चूल्हा नहीं जलेगा।बारहों मास चूल्हा जलाने के लिए यह आवश्यक है कि वर्ष के प्रथम दिन में भूमिदाह नहीं किया जाए।इस वर्ष की पकी हुई चीज उस वर्ष खाएँगे।"-- #मैला_आँचल (फणीश्वर नाथ रेणु)
मान्यता है कि आज सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है।आज के दिन शीतल जल से भरा घड़ा, सतुआ और ताड़/बांस के पंखे को इस विश्वास के साथ दान किया जाता है कि अगले जन्म (या आने वाले समय में) की प्रचंड गर्मी में यह दान काम आएगा।
आज ही के दिन खरवास समाप्त हो जाता है और शुभ कार्य शुरु करने का मुहुर्त प्रारंभ हो जाता है।सोलर कैलेंडर को मानने वाले आज के दिन से नववर्ष की शुरुआत मानते हैं इसीलिए बहुत जगह आज ही से नया खाता-बही बनाया जाता है।
आज के दिन प्रत्येक माँ सुबह अपने बच्चे के सिर पर बासी पानी इस विश्वास के छिड़ककर जगाती है कि वह साल भर जुड़ाए रहें।तड़के उठकर प्रत्येक महिलाएं अपने घर के सामने पानी छींटती है, फिर जमीन को गोबर से लीपती है उसके पीछे यह मान्यता है कि भीषण गर्मी में उनके भाई/बच्चे/प्रिय के पांव में फफोले नहीं पड़े।
इस त्यौहार को मनाने वाले लोगों में यह अटल विश्वास है कि साल के पहले दिन चूल्हा नहीं जलाएं क्योंकि एक दिन भूमिदाह नहीं करना चाहिए।इसीलिए आज मध्याह्न में भोजन नहीं बनता है।आज के दिन सतुआ के साथ कच्चे हरे आम( टिकोरा)और पुदीना की चटनी खाने का अद्भुत महत्व है, साथ में गुड़ तो होता ही है।
हमारे देश के लोकपर्वों की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा है उसी शृंखला में इस लोकपर्व की भी यह खूबी है कि इस तेज गर्मी के मौसम में उपर्युक्त सामग्री के खान-पान का वैज्ञानिक और स्वास्थ्यगत महत्व है।वैसे अनेक जगह आज के दिन दलपुड़ी,सत्तूपुड़ी,लिट्टी,गुड़ामा,आदि भी बहुत चाव से खाया जाता है।
भारतवर्ष के विभिन्न हिस्सों में यह लोकपर्व थोड़े-बहुत परिवर्तन से अलग-अलग जगहों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।बंगाल के लोग मेष संक्रांति के एक दिन पहले ‘पांतो भात’ करते हैं जबकि बिहार के लोग"सिरवा"करते हैं।
बंगाल में इस दिन को ‘नाबा वैशाख’ या ‘पोइला वैशाख’, बिहार में ‘सतुआन’',"#झारखंड_में_बीसों ", केरल में ‘विशु’, असम में ‘बिहू’, पंजाब में ‘वैशाखी’, तमिलनाडु में ‘पुदुवर्षम’, उड़ीसा में ‘पाना संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथाण्डु’, मिथिलांचल में ‘सतुआनि’ और ‘जुड़ि शीतल’ के नाम से मनाया जाता है।
©अजय शुक्ला

No comments:
Post a Comment