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#गर्मी की छुट्टियों में ही गांव गुलजार होता है। आम के पेड़ की छांव में दरबार सजती है। इस मौसम में दही और मट्ठा के साथ #अमझोरा की सोंधी खटास और दलपुड़ी के साथ #गुड़ामा के मिठास की यादें अविस्मरणीय रहती है। यह मौसम किस्से -कहानी सुनने का, नीले आसमान में चमकते चांद-सितारों को देखने का होता है। जहाँ बड़ों के ठहाके और महिलाओं की गंभीर #गप्पबाजी के साथ-साथ प्रत्येक घर आंगन में सिर्फ बच्चों की #किलकारियां गूंजती है।
शहर के लोगों में तो खुशियों की तलाश के लिए किसी त्योहार का इंतज़ार रहता है। औपचारिकता और दिखावे के लिए वह खूब तैयारियां भी करते हैं। लेकिन गांव में तो हर मौसम ही त्योहार की तरह होता है।खासकर छोटे बच्चों और बूढ़ों के लिए तो, गर्मी का मौसम गांव का सबसे बड़ा त्योहार होता है। चाहे कितनी भी आग उगलती गर्मी हो लेकिन आम के पेड़ की घनी छांव में बच्चों की ही नहीं बल्कि बड़ों की भी #पंचायत बैठती है।
#फाल्गुन महीने के शुरू होते ही आम के पेड़ों में मंजर आने लगती है और हो जाता है गर्मी के मौसम का आगाज..... । #चैत माह में आम के पेड़ पर छोटे छोटे,कच्चे फल आ जाते है। लेकिन बच्चों को इस से क्या फर्क पड़ता है, उन्हें तो बस कच्चे आम ही चाहिए होते थे। सभी गांव की तरह ,हमारे गांव में जगह-जगह आम के पेड़ हैं। हम उन पेड़ों के अलग-अलग #मजेदार नाम से जानते हैं।
हमारे गांव के प्राईमरी सरकारी स्कूल के बाहर एक आम का पेड था। जिसका नाम था '#नटवा'। उस घने पेड़ के आम छोटे- छोटे होते थे। इसी क्रम में दोहर खेत में आम के दो पेड़ साथ-साथ थे। उसका नाम था #लहसुनिया। उसका फल एकदम लहसुन के आकार जैसा होता था, पतला-पतला। जबकि जामुन के पेड़ के पास जो आम का पेड़ था, उसका नाम था-'#सवनी'। यह सिर्फ सावन के महीने में ही पकता था। ऐसे ही सिंदूरिया,चरकाही, जिरवा जैसे आम के पेड़ों के अनेक नाम थे। और उन सभी के नाम के पीछे की एक ठोस वजह भी थी ।
आमतौर से दोपहर के वक़्त हमारी मम्मी सारे बच्चो को डांट- डपटकर सुला देती थी ताकि हमलोग #लहर धूप में निकल नहीं पाए। लेकिन उसको क्या पता कि आंधी जितनी तेज चलती है, हम सभी के मन में उत्साह, उतना ही उफान पर होता था। आखिर आम जो गिरते थे हवा के थपेड़ों से। और जब भी ऐसा हो, कोई हमें रोक नहीं पाता था। हम पूरी गति के साथ आम के पेड़ तक पहुंचने के लिए बेतहाशा दौड़ पड़ते थे। अपने आप में ही कॉम्पटीशन होता था कि सबसे पहले पेड़ के नीचे जाना है और सबसे ज्यादा आम चुनना हैं। कोई नटवा पेड़ के नीचे तो कोई लहसुनियां के तो कोई जीरवा के..... ।
और अगर तूफान नहीं भी आए। फिर भी बहाने बनाकर हम आम के पेड़ के नीचे पहुंच जाते थे। साथ में लकड़ी, ज्यादा लंबी तो नहीं, बस एक - ढेढ़ फुट का #झेब्दा या #लेबदा, ताकि पेड़ पर लगे आम को गिराया का सके। और जब तक तूफान कम न हो जाए , शाम न हो जाए या घर से मम्मी छड़ी लिए न आ जाए तब तक हटना नहीं था आम के पेड़ के नीचे से। हम पूरी निष्ठा, समर्पणशीलता और कर्मठता के साथ वहीं पर डटे रहते थे।
कच्चे आम को धोकर खाना, नमक के साथ खाना या फिर अमझोरा बनाकर स्वाद का आनंद लेना। इन सभी प्रक्रिया के लिए हमारे पास धैर्य नहीं था। अपने परिश्रम से अर्जित इस बहुमूल्य संपत्ति को हम लोगों ने न तो घर पर अचार बनाने के लिए दिया और न ही अमझोरा बनाने के लिए। हम लोग तो आम को बिना धोए ही तत्काल चट्ट करने में विश्वास रखते थे। कहा जाता था कि कच्चे आम के #लस्सा से मुँह में घाव हो जाता था।यह लोकोक्ति तब प्रमाणित होती थी जब हमारे मुंँह में होंठ के आसपास #घाव हो जाता था और हम बंदरमूंहा दिखलाई पड़ने लगते थे।
कच्चा आम खाकर उसकी #गुठली, जो ज्यादा मजबूत नहीं होती थी उससे हम मनोरंजक खेल खेलते थे। और वह ऐसा खेल था, जिस से हमें पता चलता था कि किसकी शादी किधर होगी, भले ही उसका परिणाम गलत साबित होता था। कभी-कभी सच भी हो जाता था। हम आम की गुठली हाथ में एक छोर पर लेकर, बोलते थे -
"कोल कोलास, भादो मास, पुजवा के बियाह कने ?? " और जिधर गिरता गुठली, समझ जाते पुजवा के बियाह उसी दिशा में होगा। और फिर पूजा, यही चीज मेरे नाम के साथ भी करती कि मेरी शादी किस दिशा में होगी। पूजा मेरी दोस्त का नाम था और वह भी मेरे साथ-साथ आम चुनने आती थी ।अब तो पूजवा का सच्चे में बियाह हो गया है। अनजाने में गुठली वाली वह बात सच साबित हो चुकी है।
और जैसा कि हर कहानी में सुख के साथ दुख भी रहता है। हीरो के साथ विलेन भी रहता है, वैसे ही कभी-कभी हम बच्चों के साथ भी होता था। अब बच्चों को क्या मालूम कि आम के पेड़ पर किसी दूसरे का स्वामित्व होता है। जैसे आम चुराना बच्चों का काम था, उसी प्रकार #फुरसतिया बूढों का काम आम की रखवाली करना था। एक बार तो बड़ी मुश्किल से एक प्लास्टिक की बड़ी थैली में आम भरकर जमा किए थे। एक बाबा डंडा लेकर पीछे पड़ गए। डराने लगे। आत्म सम्मान जगने और (डर में आकर) हम भी पूरी भरी थैली को, उस निर्दयी बूढ़ऊ के सामने फेककर, रोते-रोते घर चले आए। बाद में बहुत अफसोस भी हुआ कि इतनी मेहनत से एक प्लस्टिक की बड़ी थैली भरकर आम चुने थे।थोड़ा जोर लगाकर भाग जाना चाहिए था। वैसे गाँव में बच्चा और बूढ़ा की लड़ाई हमेशा ही बड़ी मजेदार होती है, और वह भी गांव के #भौकुली साथ रखने वाला बाबा से..... ।
गांव में आम के पेड़ से जुड़ी कहानी तो, और भी है।लेकिन पोस्ट बहुत लंबा हो गया है। अगर आपको यह स्मृतिकथा अच्छी लगी तो बताइएगा जरुर....। गर्मी की छुट्टियों में आपके घर के पास वाले आम की पेड़ के साथ, आपकी कुछ नयी स्मृतियां उछाल मारने लगे तो कमेंट बाक्स में लिखिएगा जरूर। हम सभी को, पढ़कर बहुत अच्छा लगेगा।

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