Friday, April 1, 2022

#महुआ


महुआ शब्द में ही मिठास है। इस विषय पर सोचने और लिखने से आँखों में खुदबखुद चमक आ जाती है। यह शब्द हमारे इतिहास,संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। वैदिक काल से लेकर अभी तक महुआ के फूल,फल और पेड़ की लोकप्रियता की गूंज चारों तरफ सुनाई पड़ती है।
अनेक शोध के उपरांत पता चलता है कि हिन्दी साहित्य में महुआ को जो प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए। उम्मीद के अनुसार वह नहीं मिल पाया है। हमारे साहित्य में अधिकांश साहित्यिक विधाओं में यह सिर्फ नायिकाओं का लोकप्रिय नाम रहा है। 'महुआ' हो या 'महुआ घटवारिन' हिन्दी साहित्य की विभिन्न लोकप्रिय कथा साहित्य में यह नाम हमें गुदगुदाता रहा है। किंतु लोकसाहित्य में इस नाम की प्रतिष्ठा शुरु से बरकरार है।स्थानीयता के संदर्भ में देखें तो लगभग प्रत्येक अंचल में आपको अभी भी 'महुआडांड' और 'महुआपारा' जैसे अनेक स्थानों के नाम दिखलाई/सुनायी पड़ते हैं।
उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों म़े महुआ पर विभिन्न लोकगीत प्रचलित हैं।चाहे मिथिला हो या भोजपुरी अंचल,बघेली हो या बुंदेली...। महाराष्ट्र हो या तमिलनाडु। सभी जगह में इसको केन्द्र में रखकर ढ़ेर सारे गीत रचे गए हैं। छोटा नागपुर क्षेत्र के आदिवासी अंचल जिसमें झारखंड और छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्से सम्मिलित है,वहाँ तो इस पर अनगिनत लोकगीत उपलब्ध हैं।
महुआ झरे,महुआ टपके,महुआ बिनने आदि पर अनेक सौंदर्यपरक लोकगीतों के साथ कुछ पारंपरिक गीत भी प्रचलित हैं। जैसे - "अमुआ मंजरी गेल महुआ मजरल गे सजनी, परि गेल चन्नन के ढार..." या फिर ""अमवा महुअवा के झूमे डरिया,तानी ताका न बलमुआ हमार ओरिया .." इन गीतों को सुनकर हम उस प्राकृतिक परिवेश में खो जाते हैं। जहाँ हम जैसे बहुत सारे लोगों को महुए पेड़ के नीचे महुआ बिनने की अपनी बहुमूल्य स्मृति जुड़ी हुयी दिखलाई पड़ती है।
प्राचीन किवदंतियों के अनुसार इसकी उत्पत्ति देवासुर युद्ध से जोड़ी गयी है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह समुद्रमंथन के उपरांत बहुमूल्य कल्पवृक्ष है।जिसके फल और फूल ही नहीं बल्कि तना, छाल, जड़, बीज, तेल, अर्क, पत्ते आदि सभी हमारे लिए उपयोगी है।इस वृक्ष की लकड़ी अत्यंत मजबूत एवं चिरस्थाई होती है. अधिक समय तक टिकाऊ होने के कारण महुआ वृक्ष की लकड़ियों का इमारती लकड़ी के रूप में प्रयोग किया जाता है जो सर्वसुलभ और सस्ती इमारती लकड़ी है।
हमारी दिनचर्या में दातुन का प्रयोग करना हो,मांगलिक कार्यक्रम में मड़वा गाड़ने में लकड़ी की बात हो या फिर साबुन,तेल,दवाई बनानी हो। स्वादिष्ट खाद्य प्रदार्थ के रुप में इससे तैयार हलवा(लप्सी),लड्डू,रोटी,मिठाई आदि की लंबी श्रृंखला है।इसके सुखे हुए फूल से तैयार 'हर्बल मदिरा' भी ग्रामीणजनों में बहुत लोकप्रिय है।अंग्रेजी शासनकाल में तो आबकारी शुल्क में नुकसान होने के कारण इन पौधों को उखाड़ने की असफल कोशिश भी की गयी थी। किंतु आज भी यह वृक्ष,फूल और फल हमारी आदिम संस्कृति की पहचान रही है और आधुनिक परिवेश में भी अपनी बहुमूल्य उपयोगिता को प्रदर्शित करती रही हैं और करती रहेगी।इस संदर्भ में आपके पास भी कुछ नयी जानकारी,कुछ अनुभव और स्मृतियाँ हो तो आप भी अपने अनुभव और स्मृतियों को शेयर करें तो हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा।
©अजय शुक्ला
प्राध्यापक हिन्दी

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