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जब अहले सुबह आंख खुलते ही पलाश के फूल देखते ही मन मचलने लगे और दिल के तार झंकृत होने लगे तो समझो फागुन अपने उफान पर है। महुए के फूल की मादक खुशबू प्रभात की बेला में नाक के रास्ते मन तक पहुंच दिल को मदमस्त करने लगे तो तो समझो फागुन की तरंगें हिलोरें लेने लगी हैं। महुआ और पलाश के 'सुमन' बीच से निकलती हवा जब अलग 'रागिनी' छेड़ने लगे और चहुंओर जब आनंद छा जाए तो समझो रंगों का त्योहार दस्तक देने लगा है।
यही हाल अपना है। मेरे मित्रों का है। यूं कहें कि पूरे देश का है। जिन्हें मेरे गृह जिले पलामू और राज्य झारखंड की जानकारी है, वे पलाश व महुआ की सांस्कृतिक और आर्थिक महत्ता से भली भांति परिचित होंगे। इन दिनों चहुंओर पेड़ पर पलाश और महुआ के फूल पेड़ों पर लदे हैं। पलाश का फूल पेड़ पर अपनी खूबसूरती बिखेर रहा है। ऐसा लगता है कि पूरा इलाका भगवामय हो गया है। महुआ के फूल की खूबसूरती जमीन पर दिख रही है। जहां तक पेड़ फैला हुआ उसके नीचे सफेद चादर सी बिछी पड़ी है।
पलाश के फूल को सुखा कर गुलाल बनाया जाता है। बिलकुल प्राकृतिक आज की भाषा में आर्गेनिक। फूल को पानी में डाल कर छोड़ दें तो ऐसा रंग तैयार होता है कि रंगों से दूर रहने वाली भी कहे-रंग दे मोहे...। बसंत समाप्त होते ही पलाश पर लाह का लगना। फिर इन्हें उतारकर बाजार तक पहुंचाना। लाह से बनी 'लहठी’ नारी की कलाई पर आती है तो उसके सौंदर्य को बढ़ाती है। लेकिन जब लाह को पिघला कर 'मुहर’ लगाया जाता है बड़ी-बड़ी चीजें 'सील’ हो जाती हैं।
अब बात महुआ की। अभी सफेद, बिलकुल दूध की तरह, महुआ पेड़ पर है। सुबह में सूर्य की किरणों से पहले यानी प्रभात में ये फूल चूने लगते हैं। इन फूलों से बचपन की दो यादें जुड़ी हैं, एक खाने की तो दूसरी चुनने की। तब हम दोनों भाई मौका पाते ही पनेरीबांध चले जाते थे। पनेरीबांध से कोई पांच-सात किलोमीटर पर था माई (दादी) का ममहर खोहरी। यहां रहने वाले उनके भाई चंदरदेव बाबा दूध में सिझाया हुआ महुआ ला देते थे। अद्भुत मिठास होती थी इसकी। डालटनगंज में हमलोग प्रो. केएस अग्रवाल जी के मकान में रहते थे। सुबह हुई नहीं कि हम दोनों भाई, उनके दोनों बेटों राजू और संजय के साथ घर के पास के महुआ के पेड़ से सीजन की शुरुआत में फूल चुन लिया करते थे। शुरू में ये गिनती में होते थे जिन्हें हम छुपा कर रखते थे। सीजन खत्म होते-होते सभी कुछ किलो के मालिक हो जाते थे।
अपने इस अमूल्य खजाने को हम सभी पास की एक दुकान में बेचते थे। पांचवीं-छठी कक्षा में आते-आते ज्ञान चक्षु खुलने लगे और बंद हो गया महुआ चुनना। बाद में पता चला कि इस महुए का तो अलग ही अर्थशास्त्र है। फूल सूखने के बाद पशुओं को चारे के रूप में दिया जाता है तो इससे पारपंरिक शराब भी बनती है। तभी तो हमारे जिले में एक बात प्रचलित है-फलनवां, सहिए-सांझे महुआ चढ़ा लेले हऊ। फूल जब फल का रूप ले लेता है तो इसका महत्व और बढ़़ जाता है। इसके बीज से तेल निकलता है, जिसे डोरी का तेल कहा जाता है। इसका इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन और डिटरजेंट बनाने में होता है।
कुल मिलाकर कहें तो महुआ और पलाश मेरे जिले की सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक संबल देने वाले हैं। आइए, इनकी खूबसूरती को निहारते हुए 'फगुआ’ के गीतों के साथ झूमें, उमंग और तरंग में डूब जाएं।।
© प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा

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