Friday, March 4, 2022

जा ई इहई छूट गए

 

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एक बार हुआ क्या कि घरे से चाचा चाची के प्लान बना कि मामा घर जाना है। अब सबे घर के लईकन जईसन, हमरो उहे हाल था। बड़े चाचा थे हमारे वो माई पापा से ज्यादे ही हमको मानते थे। अब जब मामा घर जाने के प्लान बना तो हमरो से कहल गया कि चलबे का? तो हमरा कहाँ देरी था, हमहूँ रेडी। जाए के दिन तनी जल्दही रेडी होके, दशहारा में जे लियाईल कपड़ा था उहे पहिन के तैयार थे। सब के गोड़ उड़ लाग के एकदम साईकिल में बैग लदा गया। हमहूँ साईकिल के कैरियर पर आगे बैठ के रोड पर आ गए। काउंटर पर के कन्हाई साव के चाय दुकान में चाय निमकी खाये और गाड़ी के आसरा देखने लगे। सब बैठ के बार बार पूछे कि" इनको जाए लाबा का? "
हम अलगे परेशान कि मर-तेरी! तैयार हो के आइल ही जाहिंला न, आऊ ई सब कहैत हथ कि इनको जाना है? ईसब मने हल्का में लेवैत हथिन का हमरा? नया कपड़ा जूता मोज़ा सब, का मुँह देखेला पहिन के आईल ही?
अब बस आने के टाईम हुआ ओइसहीं सब प्लान बनाना चालू कि जइसहीं बस आएगा पहिले चाची चढ़ जाएंगे फिर सब बैग चढ़ाना है फिर चाचा बैठेंगे। हम तुरंत पूछ दिए कि- "आऊ हम जे"। तब ओने से कन्हाई साव कहे कि-" हँ उसके बाद आपको चढ़ा देंगे पंडीजी" , इतना सुने तब जा के खुशी हुआ।
अब बस आया। सब एकदम हड़बड़ा गए… जल्दी जल्दी के चक्कर मे। चाची चढ़ गई, तुरन्त दूनो बैग चढ़ गया। चाचा भी चढ़ गए । अब बस वाला बढ़ाने लगा.. अब हमर अकबकी अलगे कि हम चढ़ बे नहीं किये ई बढ़ा कैसे रहा है , कुछ समझ में आता ओकर पहिलहीं कन्हाई साव गोदी में उठा के दौड़ने लगे। बस बढ़ा दिया और ई पीछे कुछ दूर तक हमको लेके दौड़ रहे हैं और कह रहे हैं - " अरे रुकिए रुकिए एक सवारी छूट गए , छूट गए ।" अब बस काहेला रुके जाओ। हम रोना चालू आऊ बस वाला पर गोसा रहे हैं। तब तक ओने से पापा साईकिल लेके आये और पूछे कि "का होलाई ? काहेला रोवाईत हे । तब कन्हाई साव बताये कि का बात हुआ सो । अब इतना सुनते पापा एकदम ताव से कि रुक तो सार छोड़ के भाग गया बस वाला , आव बैठ तो साइकिल पर हमीन साईकिले से जल्दी पहुँच जाईब। हमहूँ ताव से बैठ गए पीछे एकदम सीट पकड़ के । साईकिल चला और हम ख़ुश। 10 मिनट में अगला मोड़ से होते हुए देखे कि घरे वापस पहुँचा दिए। घरे आये मुँह लटकाए रहे। लेकिन गोसा तो बस वाला पर तब से जब तक ईयाद रहा तब तक रहा। लेकिन जब से बात बात में असली मैटर पता चला तब से कन्हाई साव से तो और जादे गोसा हो गया।लेकिन उ लईका के उमंग और कहीं साथे जाए कि ललक। अब कहाँ, अब तो घरे से कहल जाता है तबो आदमी जा नहीं पाता है। आपलोग के भी अईसन कुछ हुआ है का तो बताइयेगा जरूर। वैसे कहानी खाली हम लिखें है लेकिन असली पात्र हमर भाई विधु बाबू थे।
आनंद केशव "देहाती"
May be an image of text that says "आनंद केशव 'देहाती' ठेठ पलामू"





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