Friday, March 11, 2022

सेमल

विशाल वृक्ष,
रक्तिम पुष्प,
रुई के फाहों से अहलादित,
लट्टू बने फल के खोप्चे से आनंदित.
कभी किसी ने पलाश समझ खिंचाई की ,
किसी ने गुलमोहर समझ बड़ाई की,
पर वो खड़ा रहा बरसों से बस यूँ ही-
देसी भाषा में रचित अनगढ़ कविता की पंक्तियों सी,
भावनाओं से भरपूर पर अबूझ सी,
तकती रहीं उसकी शाखाएं -
गरम लू के थपेड़ों, अवरुद्ध बारिश की अविरल बूंदों औऱ सर्दी में ठीठुरते मनुजों को.
तकियों, लिहाफों में प्रस्फुट बच्चों की नींद की तरह-
सडक किनारे खड़ा अविचल छाँव है वो -
विशाल वृक्ष!
सेमल और कपास में अंतर है। कपास से सूत , सूत से धागे और धागे से सूती वस्त्र का निर्माण होता है. सेमल की रुई से फुलके तकियों के अलावा कुछ और बनाना ज़रा मुश्किल है। लेकिन इन मुलायम तकियों का एक अलग महत्त्व है. प्रताप नगर के आम बागान के आसपास वाले क्षेत्र सेमल के कई वृक्ष कई वर्षों से अचल खड़े हैं। हमारे ह्रदय में सुवासित 'पलामू-पन ' की तरह , बिना आसपास के बदलते परिस्थितियों की परवाह किये , इन्हें बस छाँव, आराम और सुकून देना ही आता है। यद्दपि नन्हे पक्षियों के प्रवासी बनने , पंख होते ही बड़े शहरों में पढाई लिखाई , रोजगार के लिए उड़ जाने के बावजूद , पलामू वासियों का 'पलामू-पना' नहीं जाता चाहे वो कहीं भी चले जाएं. आखिर ये 'पलामू-पना' है क्या ? कोई बहुत गूढ़ या विशिष्ट रहस्य नहीं है। अपितु बहुत ही सहज, बहुत ही साधारण चीज़ें हैं जो पलामू की धरती को नरम मुलायम रुधिर सी भूमी बन सींचती हैं.
वाक्या - तीन साल वयस होगी बच्ची की. आज से तीन दशक पूर्व ,अपने माता पिता संग दिवाली/धनतेरस की खरीदारी करने दुपहिया स्कूटर पर बैठ घास-पट्टी , सब्ज़ी मंडी से खरीदारी करने तीनों निकले थे। माँ उतर कर ऊँचे किराना दूकान पर समय बचाने के लिए पहले ही उतर गयीं। बच्ची को उसके पिता ने कहा, " जाओ अपनी माँ के पास,मैं स्कूटर को सही जगह बना कर लगा कर आता हूँ।" बच्ची आज्ञाकारी थी, बिना झिझक के वह कुछ कदम चल अपनी माँ की हरी साड़ी का पल्लू पकड़ खड़ी हों गयीं. शायद इतने छुटपन में उसकी निगाहें उस महिला के चेहरे तक ना जा पायी. 2 मिनट बाद अनिभिज्ञ, अनजान महिला आगे बढ़ गईं. वो बच्ची कोलाहल में अचानक गायब हों गयीं उन माँ जैसी महिला का पीछा भी नहीं कर पायी. फिर नन्हे मस्तिष्क ने जाने क्या समझा बूझा , बच्ची भी आगे बढ़ने लगी. इतनी भीड़ थी की इंसानों को भी पैदल चलने में असुविधा हो रही थी. इतने में जाने कहाँ से 2-3 गईया, सब्ज़ी वालों के कचरे से अपना भोजन ढूंढती दिख गईं. आम तौर पर ये बड़ा ही साधारण दृश्य होता है, भयंकर भीड़ में उन मासूम किन्तु जिद्दी मवेशियों की उपस्थिति. साढ़े तीन साल की बच्ची को डराने के लिए ये विहंगम दृश्य पर्याप्त था. कुछ दूर यूँ ही घिसट के चलने के बाद थोड़ी खाली जगह देख वो एक आलू वाले के पास रोनी शकल लिए खड़ी हों गयीं.
उधर बच्ची के अभिभावक बुरी तरह डर गए थे. पूरी सब्ज़ी मंडी, महावीर मंदिर तक देख आये, कंठ अवरुद्ध हों गए, भय से चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी थी.
उधर छोटी बच्ची को एक आलू वाले ने सुबकते देख लिया था. सफ़ेद खद्दर के धोती, कुर्ते, पगड़ी पहने छः फुट के मुस्लमान आलू वाले ने यह भाँप लिया था की बच्ची खो गयीं है. दुलार से उसे पुचकारते हुए, अपनी सब्ज़ी के टोकरियों को बोरे से ढांप, पडोसी कुंजड़े को ध्यान रखना बोल वो तुरंत बच्ची को अपने कंधे पर बिठा निकल पड़ा. काबुलीवाले औऱ मिनी के सामान ही दोनों में एक अस्फुट जुड़ाव हों गया. तभी तो बच्ची ने सुबकना छोड़ दिया था. इस पूरे घटनाक्रम में मुश्किल से 15 मिनट निकले होंगे पर दुनिया उलट पुलट सी प्रतीत हों रही थी.
कुछ ही पलों बाद बच्ची के माँ बाप दृष्टिगोचर हों गए. आलू वाला पिताजी को देख सकपका सा गया. क्यूंकि ये वही महानुभाव प्रोफेसर साब थे जिन्होंने उसकी सुपुत्री को गत दिनों ना सिर्फ इंटरमीडिएट में दाखिला दिलाने के लिए उसको औऱ उसके परिवार वालों को राजी किया था बल्कि फीस भी अपनी जेब से दे डाली थी . कर्मा चक्कर लगा वापस उसी धुरी पर पहुंचा देता है. उसी आलू वाले को प्रोफेसर साहब की बेटी की जान बचाने, वापस घर पहुँचाने का मौका मिलना था. आज ऊपर वाले ने देश, समाज, जाति की संकीर्ण चारदिवारी से परे हट मानवता की एक अलग शिक्षा दी थी. उस अभिभूत करने वाले पल ने माँ बाप, बच्ची, आलू वाले औऱ उस पूरे धनतेरस वाली ठेलमठेलम भीड़ को किंकर्त्तव्यविमूढ कर डाला.
सेमल बेहद साधारण पर कई मायनों में विशिष्ट पेड़ है. पलामू भी!
1. अपनी तीन दशक से कुछ ऊपर के जीवन में मैंने कभी यहाँ जातिगत दंगे, विवाद होते नहीं देखा ना सुना. कोएग्जिस्ट करने की इसी आदत ने हमें कोस्मोपोलीटन बना दिया है.
2. गुरुजनों का यहाँ विशेष आदर मान है, रुतबा किसी कलेक्टर से कम नहीं है. गुरु को गोविन्द से कम ना समझना एक अलग प्रकार की विशिष्टता है.
3. बिजली की कटौती, पानी की समस्या, मच्छर, काफ़ी सारी बुनियादी समस्या हम लोगों ने सामान्य शहरों से थोड़ा अधिक ही झेली है, पर इसी सहनशीलता ने ही तो हमें हर मुसीबत से डट कर मुक़ाबला करना सिखाया है.
4. संतुष्टि- जहाँ आजकल की दुनिया में आपातकाल समझ कर अत्रिप्त् आकांक्षाओं के पीछे भागते मनुष्य ही ज्यादा रहते हैं, पलामू वासियों ने महत्त्वकांक्षा रखना, सपनों को पूरा करने के लिए जतन करना तो सीखा ही, पर अंत में संतुष्ट हो थमना भी सीखा है.
5. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर, ईश्वर के किसी भी निवास स्थान के बाहर से गुजरते हुए सर झुकना, हाथ जुड़ना या क्रॉस बना श्रद्धा पूर्ण व्यवहार भी एक बानगी है |
सेमल की तरह पलामू - पना बहुत साधारण होते हुए भी काफी विशिष्ट गुण है. इसपर आपका क्या विचार है?
©शिवांगी
May be an image of text that says "सेमल palamu thaln © शिवांगी"

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