Tuesday, March 1, 2022

यादों के सिलसिले

 सर्दी की सुबह आमतौर पर तो धुंध , बादलों और हलकी ठिठुरन से ग्रस्त रहती हैं. लेकिन अब ऐसी सुबह हमारे शहर के एकलौते छोटे एरोड्रोम की जलवायु के लिए गुलाबी ठंडक और बासंती ब्यार में लिपटे मद्धम सूर्य की रौशनी में नहाने का पर्व सा है. एरोड्रोम और एयरपोर्ट में एक बारीक किंतु गहरा फ़र्क़ होता है। एरोड्रोम सिर्फ छोटे विमानों/हेलीकाप्टर के उतरने और उड़ने की तात्कालिक व्यवस्था मुहैया कराती है (बहुत कुछ मेरे सुबह की सैर में आते जाते विचारों की तरह ) एयरपोर्ट का मतलब पूरी हवाई ट्रैफिक के सञ्चालन , विमानों के आवागमन , यात्रियों की सुविधा हेतु बनवाये गए कई प्रावधानों का एक जगह पर होना है. यद्यपि कुछ एक साल पहले हमारे मासूम, आडंबरहीन हवाई अड्डे को अच्छे खासे एयरपोर्ट में बदलने की बात चली थी , पर फिर वो मासूमियत और कुछ अंदरूनी संवेदनाओं का क्या होता? अच्छा हुआ कुछ नहीं हुआ। जो होता है , अच्छा ही होता है। ५-स्टार चॉकलेट के विज्ञापन की तरह 'कभी कभी कुछ नहीं करना भी बहुत अच्छा होता है).

हम सब लोगों ने जिन्होंने भी दुपहिया चारपहिया वाहन चलाना सीखा है , अगर चियांकी हवाई अड्डे पर रोज़ कुछ चक्कर नहीं लगाए तो वाहन चलाना क्या सीखा ? कहीं और वाहन चलाना सीखने और हवाई अड्डे पर सिखने में काफी फ़र्क़ होता है. खुली , खाली सड़क के ऊपर ऊँचे गियर में ऊँची गति से गाड़ी उड़ाने (चलाने ) से ले कर अनगिनत गड्ढो के मध्य से विनय से ओत-प्रोत दूसरे गियर में २५ की गति का दामन थामे रखने तक का अनुभव सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।ऊबड़खाबड़ रास्तों पर चलने से आप अपने सुखी संसार से उचक के कुछ समय के लिए अचानक जागृत हो जाते हो , जीवंत भी ,और ज्यादा ज़िंदा भी। मेरे लिए इन तथ्यात्मक पहलू के अलावा भी इस स्थान के कई मायने हैं.
पृष्ठभूमि काफी रोचक है इस जगह की. एक तरफ जहाँ अपने कैशोर्य की अंतिम वर्षों को पूरा करते उत्साही बच्चे अपनी दुपहिया को हवा की गति से उड़ाते , अपने जैसे और दुबले पतले २-३ मनुष्यों को बिठा नायकगिरि की नयी बुलंदियों को छूते दिख जायेंगे तो दूसरी तरफ नव-धनाढ्य अपनी उम्र के दूसरे, तीसरे, चौथे दशक में पहुँचते हलकी काया ,उभरते तोंद वाले कुछ मनुष्य अपनी क्रिकेट कला को प्रदर्शित करने और तंदरुस्त रहने की दिशा में चहलकदमी करते दिख जाते हैं. यद्यपि मैंने उनमें से किसी को भी खड़े रहने , गपियाने और यदा कदा ५ कदम प्रति मिनट के हिसाब से दौड़ने के अलावा कुछ करते नहीं देखा है. २६ जनवरी के आसपास पहली बार चूने से उनके खाली मैदान (-हवाई अड्डे की पक्की सड़क से इतर ) पर कुछ सुर्ख घेरे बनाते देखा. कह नहीं सकती की वो गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में कुछ कार्यक्रम हेतु था या फिर एक और सहज प्रपंच !अपने ढाई किलोमीटर सुबह की सैर और कुछ चक्कर वाहन-सीखो अभ्यास के बाद मैं इस उम्मीद में थी की झंडोतोलन करके हमलोगों को भी लड्डू जलेबी मयस्सर होंगे, किन्तु अफ़सोस ऐसा हो न सका , या शायद मैं जल्दी वापस लौट आयी होंगी। नाउम्मीद क्यों होना है ? बहरहाल मेरी परेशानी क्रीड़ा करते मनुष्यों की ख़ुशी नहीं , कुछ और ही है.
जो थोड़ा आराम और बहुत काम करते हैं वे कभी नहीं कहते कि उन्होंने बहुत किया। अति का भला न बरसना , अति की भली न धूप , अति भला न बोलना , अति भली न चुप ! कुछ कुछ ऐसा ही सुना था मैंने बचपन के किसी हिंदी व्याकरण की पुस्तक में. यदि कोई कहे कि उन्होंने बहुत काम किया, तो अर्थ है कि वे और कर सकते हैं; पूर्ण रूप से नहीं किया। काम करने से इतनी थकान नहीं होती जितनी कर्तापन के भाव से होती है। पूरी तरह कर्म करने में रहना चाहिए , कर्तापन के भाव से रहित होकर। इससे पहले की मेरे से व्याकरण की बद/खुश बू साफ़ साफ़ आनी लगे, मैं मुद्दे की बात पर आती हूँ.
एरोड्रोम की एक चारदीवारी को सांझा करती उस विद्यालय की प्राचीर है जहाँ मैं अपने जीवन के १२ साल व्यतीत किये हैं. पढ़ना , लिखना , जीना - काफी कुछ सीखा है वहां से। कोरोना काल की समाप्ति के बाद थोड़ी तेज़ , थोड़ी न्यून होती , सुबह की सभा की आवाज़ मुझे सामीप्य , अपनेपन , आत्मविश्वास - जाने क्या क्या का आभास करवाती हैं. ब्रिस्क वाक के दौरान ह्रदय और दिमाग की गति एक सी हो जाती हैं , तेज़ , बहुत तेज़. मेरी परेशानी ये है की क्रिकेट खेलती दो दर्ज़न आँखें कुछ ज्यादा ही धीमे चलती गाडी को अवश्य ही पहचान गयी होंगी और उतनी ही जोड़ी जुबानों ने आपस में जाने क्या क्या बातें की होंगी। न तो मैं उनकी बातें सुन सकती हूँ , न ऐसा कुछ करने की इच्छा है. बस ये की बच्चों के मधुर प्रार्थना के स्वर मुझ तक पहुँचने में थोड़ी कठिनाई होती है. इस बात के दोषी पूरी तरह से वे नवीन खिलाडी नहीं है , मेरे क़दमों की बढ़ती घटती गति भी तो है.
जाने क्यों एक युवक रोज़ कुत्तों के संग कुछ ज्यादा ही अंतरंगता दिखाता है , उनके साथ हल्का फुल्का टहल लेने के पश्चात् ठीक हेलीपैड के गोले के बीचोंबीच सड़क पर बैठ उनको बिस्कुट खिलाता है , उनके संग सेल्फी लेता है - कह नहीं सकती की ये एक ट्रेंड है ( पशु प्रेम प्रदर्शन) या फिर खोपड़ी की गड़बड़ी. काफी अनुत्तरित प्रश्न भी हैं। आसपास के चियांकी गांव के कुछ ग्रामीण अपनी गऊ-शाला , बकरी-शाला का सञ्चालन भी एरोड्रोम की असंरक्षित भूमि से करते हैं. चलने के लिए बने फुटपाथ से बिलकुल सट के सूखते उपलों /गोयठे की श्रृंखला जो शुरू होती है वो उन मासूम गायों के बाड़ों की परिधि तक पहुँच जाती हैं. अगर कोई बड़े शहर वाला सूंघ ले तो शायद उबकाई आ जाये गोबर , चारों की महक से. लेकिन मेरी देहाती नासिका को ये खुशबू से कम नहीं लगते. शायद कुछ कोशिकाओं में गोयठे के धूँअन से ओतप्रोत बंगीय दुर्गा बाड़ी का चित्र इतनी गहरी पैठ बनाये हुए है की नासिका बस वही सूंघना चाहती है. यादों के काफिले में सरकारी हस्तकरघा,हस्तकला उद्योग में कार्याधीन ढाई वर्षों के दौरान व्यतीत वो पल भी बसे हुए हैं जब कार्यशाला के सिलसिले में आसपास के ग्रामीण घरों के चप्पे चप्पे से मैं वाक़िफ़ थी। मेरे सत्कार में,कभी ये बोलने पर की मैं चाय नहीं पीती , गाय का ताजा दुग्ध लोटे में परोसा जाता था। बिता हुआ पल वापस नहीं आता. अब शहर में ताज़ा दूध मिलना मुश्किल ही होगा औऱ 10 वर्ष पहले की बात है, तो मैं चाय कॉफ़ी धड़ल्ले से पीती हूं, कभी कभी अंधाधुंध संख्या में भी!
मेरी सुन्दर यादों के सिलसिले को दो विचारों ने एक साथ तोड़ डाला. जूते पहन कर तो चलती हूं, पर मेरे कदम कुछ नुकीली वस्तु से टकराये... गौर से देखने पर धूप की रौशनी काफ़ी सारी कांच को दीप्ती प्रदान कर रहे थे. ये कुछ औऱ नहीं टूटी मदिरा बोतलों के टुकड़े हैं जो करीब करीब पूरे हवाई अड्डे के किनारों में फैले हुए हैं. ये सोच कर मन काफी दुखित हुआ की पता नहीं वो लोग कैसे, कौन होते हैं जो ज़हर के बोतल उदरस्थ कर अपने आप को शूरवीर समझते हैं! टूटी कांच की किरिंचे काश उन्हें आत्म बोद्ध करवा पाती.
दूर रम्भाती एक गाय की पुकार की तरफ देखने पर मेरा ध्यान दुबली पतली काया धारिणी एक षोडिशी के गोयठे थापते कुशल हाथोँ पर भी गया. आसपास के इतने रंगीन वायुमंडल की हलचलों से अनजान अपनी भूरी गईया को ताकती बस वो थालीनुमा आकार बनाना ही जानती थी, दो वक़्त की रोटी जुगाड़ना, पशुमल से माल्यवान बनाना भी शायद जानती थी.
जाने क्यूँ बेवजह विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले साइन थीटा , कॉस थीटा, कैलकुलस, आर्गेनिक केमिस्ट्री , जुलियस सीज़र शेकसपेयर की रोमन अंग्रेज़ी से उलझते अपने सोलह बरस वाले दिमाग़ की याद आ गयी. काश कुछ जीवन पाठ आसपास की आवोहवा से सीखना भी सिखाया गया होता. कोरोना काल में कांच के सामने बिना मेकअप, बिना बनाव छिपाव के बस सीधा खड़ा होना सीख गए हम, काश ऐसे ही कुछ जीवन पाठ स्कूलों में सिखाया गया होता तो ज्यादा तैयार, ज्यादा सीधी रीढ़ के साथ खड़े हों सकते हम. सब कुछ मेरी सोच है औऱ कुछ नहीं.
©शिवांगी
May be an image of text that says "चियांकि हवाई अड्डा यादों की उड़ान � शिवांगी ठेठ पलामू"

No comments:

Post a Comment