भोजन - किंचित एक बहुत ही गंभीर शीर्षक है !
कोरोना काल की कुछ सालों में उत्पन्न आत्मनिर्भरता ने एहसास करवा दिया। कोई मुझसे पूछे कि खाने में क्या पसंद है, तो बचपन में मेहनत रहित जवाब देना बड़ा आसान था ।
2. टिफिन में सब्जियों वाली नूडल्स;
3. चिड़िया दलपिट्ठी, आलू पोस्टों चौप, पनीर मटर की सब्जी
4. हनुमान मंदिर के पेडों और परवल की मिठाई , छेना मुरकी कहां कम थीं?
5. ननिहाल के लाल अमरूद , बोरसी में भुरेठे काले चने की घुग्नी, लिट्टी चोखा ; खस शर्बत और अमझोरा
6. बांस के खोपचे में दुपहर में बुढ़िया के बाल वाली मिठाई किसी भी गुलाबी कॉटन कैंडी को मात दे सकती थी
7. अगस्त फूल की पकौड़ी , सहिजन के फूल की कचरी, दादी मां का छुहारा हलवा , करेला भरवा
8. पिताजी के उच्च रक्तचाप की दवाई के रूप में लौकी के रस के बाद बची हुई सिट्ठी को दूध में पका गुड़ वाली खीर - इस सूची के लिए तो शब्द भी कम पड़ जाएंगे।
विवाहो्तर बहुत मेहनत से सीखी रसोई के बाद मुझे सबकुछ अच्छा लगने लगा। कोई और कुछ और बना दे तो और भी अच्छा। बेटी के जन्मपूर्व मिठाई की मनाहट के बाद केक , रसगुल्ले, एकदम मीठी चीजें अच्छी लगती थीं। ऐसा लगता था जैसे बस मैं चाशनी में ही तैर जाऊं। जन्म उपरांत एक साल ऐसा रहा की बस कोई खाने को कुछ ना कहे , हर चीज से जैसे विरक्ति हो गई हो । बिटिया रानी को कुछ भी खिलाना पिलाना एक दुरूह कार्य है. कभी लगता है की उसे अपने चंदा मामा की तरह मीठा पसंद है, पर फिर निरामिष भोजन से लगाव देख कर उसके पिता की तरफ स्वाद के शक की सुई घूमती है, पर अन्ततः उसे सौंफ और अजवाइन चबाना, तुलसी पत्ते यूँ ही गटक जाना, हर दिन सादी खिचड़ी, आलू खा लेना, बिन चीनी या किसी स्वाद के दूध पी लेना, ये साबित करता है की है वो है मेरी ही बेटी. हर सप्ताह उसके स्वाद की तालिका में बस परिवर्तन होता रहता है, वैसे भी दुनिया कहती है ना, परिवर्तन संसार का नियम है, सिखने, देखने और चखने को बहुत कुछ है.
आजकल एक बंगाल के मूंगफली वाले का बनाया गाना बहुत वायरल हो रहा है . बड़े स्टाइलिश से दिखने वाले लोगो का उस गाने पर ट्रेंड होता नृत्य भी बहु-चर्चित होता जा रहा है .
"बादाम बादाम दादा काचा बादाम
आमार काछे नाइतो बूबू वाजा बादाम
आमार काछे पाबे सुधु
काचा बादाम"
पलामू में हम इन अतरंगी भाईसाहब को 'चिनिया बादाम ' कह कर सम्बोधित करते हैं. मुरही , लावा, चिनिया बादाम को मिटटी के आधे टूटे बड़े मटके में कल्हार के छोटे छोटे कटे हुए प्याज़ , हरी मिर्च के साथ न खाया तो फिर क्या पाया ? साथ में बूट झंगरी से निकल छोटे हरे चने की मिलावट बस मनोहारी है !. उसी मासूम , विनम्र चिनिया बादाम , बूट झंगरी को अंग्रेज़ियत में रंगने के बाद खाइये या फिर अपनी जड़ों को याद रखने की थोड़ी जद्दोजहत कीजिये , चुनाव तो हमारा ही है .
हमारे जनरेशन की ये समस्या बड़ी गंभीर और बड़ी हास्यास्पद है . हम कहीं न कहीं अपनी जड़ों से तो जुड़ा रहना चाहते हैं. किन्तु कोई बाहर वाला आकर जब तक आपकी अपनी मिटटी के गुण न गिनवा दें तब तक हम अनजान बने रहना चाहते हैं. फुर्सत मिले तो बस सो जाना पसंद करते है , न की कुछ स्वतः स्फूर्त उपक्रम! झुग्गी और उसमें रहने वाले लोग , उनकी संवदनाएँ हमारे यहाँ ही हैं , लेकिन जब तक किन्ही 'डैनी बॉयल ' महाशय ने 'जय हो' न बना लिया तब तक हम काफी अनजान रहे.
कल को जमुने में शिवरात्रि पर बिकते सरसो तेल में छाने 'लखट्टो' को रंगीन कागज़ में लपेट 'फ्राइड जैगरी फिंगरलिंग्स ' बोल ५००/- प्रति किलो के हिसाब से कोई बिक्री करने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा . सिर्फ 'कच्चा बादाम ' पर हाथ पांव स्टाइलिश अंदाज़ में डुला कर, ऊँचे मॉल में ऊँची कीमत पे "खादी ", "हर्बल ", "आर्गेनिक " टैग वाले सामान को खरीद कर ही हम 'मेड इन इंडिया ' या 'वोकल फॉर लोकल ' का हिस्सा नहीं बन सकते . थोड़ा नहीं बहुत अधिक गहरा सोचने की आवश्यकता है. तब तक चिनिया बादाम चबाइये औऱ कच्चा बादाम गाईये!
©शिवांगी

No comments:
Post a Comment