#ठेठ_पलामू:- मड़वा की रौनक
----------------------------------------------------------
शादी- बियाह का असली रौनक #मड़वा गड़ाने के बाद ही शुरु होता है। मड़वा वाले दिन तक लगभग सभी करीबी रिश्तेदार घर में पहुँच जाते हैं। शादी वाले घर में चहल-पहल शुरु हो जाती है। हमारे तरफ अधिकांश घरों के बीच में आँगन होता है। छोटा या बड़ा जैसा भी आंगन हो। उसी आँगन में मड़वा बनता है। सीधा के लकड़ी, बाँस, हल और कलश जैसी अनिवार्य चीजों को इकट्ठा कर लिया जाता है।
"आज जनकपुर में मड़वा बड़ा सोहावन लागे
सीता के चढ़ेला हरदिया मनभावन लागे...।"
जिसके यहाँ मड़वा का कार्यक्रम हो रहा होता है। इस गीत को सुनकर अपने तमाम दुख परेशानियों को भूल जाता है। वह #आध्यात्मिक_शांति का अनुभव करने लगता है। उसे लगता है कि इस 'जनकपुर' गाँव का वही राजा "जनक" है और उसकी फूल जैसी सुंदर बेटी सीता को हल्दी लगने वाली है।
शाम से पहले ही #बाँस_पुजाई का काम शुरु हो जाता है। महिलाएँ सज-धज कर बाँस पूजती हैं। उनकी गीतों की गुनगुनाहट से पता चलता है कि वंश बढ़ाने के लिए बाँस की पूजा की जाती है -
"बाँस पुजिला कवन राम के बाँस
अउरो छबी बंस......।"
चाहे केतनो कैमरामैन और वीडियो शूटिंग वाले मौजूद हों। छोटका बाबू-मइयां लोग बड़का मोबाईल से तड़ातड़ फोटो खींचने में बाझे रहते हैंं।ढ़ोल बजाने वाला भी बजाते-बजाते झूमते रहता है। भला खुश क्यों न हो ,आज उसके ढ़ोलक की पूजा होगी और सभी उस पर नेग भी चढ़ाएंगे -
"पुनवां पुनईतिन, तुहु हो, कवना देई,
आपन पुनवां परिछले ।
ना पुन्न देबो,ना पुन्न लेबो,
आपन पुनवां परिछले।"
फिर होगा #माटी_कोड़ने का कार्यक्रम।रात में माटी कोड़ने का सामूहिक कार्यक्रम होता है। ढ़ोलक की ताल पर सुहागिन महिलाएँ, बच्चे, बच्चियाँ घर के पास किसी धार्मिक या पारंपरिक स्थान में माटी कोड़ने के लिए निकल जाती हैं। जिसमें सबसे आगे चलने वाली दो सुहागिन महिलाएँ नव विवाहितों के समान रंगीन चटकदार साड़ी पहनी रहती हैं। खुशी और गर्व से उनका चेहरा दमदमाते रहता है।जिस रास्ते से उनका यह जत्था गुजरता है। वहाँ पर उनके गीतों की लय में सभी गुनगुनाने लगते हैं-
"कहवां के पियर माटी, कहवा के क़ुदार हेSS,
कहवां के पांच सुहागिन, माटी कोड़े जात हेSS।"
अब होता है #मड़वा_छाने का काम....पाँच शादीशुदा पुरुष यह काम करते हैं। घर की महिलाएँ या लड़कियाँ, जो देहारी की दत्ती पर बैठती हैं। उधर से मधुर गीतों की आवाज गूँजती रहती है -
"हरे,हरे, बाबा बंसवा कटईह
ऊँचे-ऊँंचे मड़वा छवईह हो
ऊँंचे ऊँंच मड़ऊआ तर बईठिह हो बाबा
सजन लोग छेकले दुआर हो ....।"
उधर साली और भौजाई लोग भी इसी मौके का इंतज़ार करती रहती हैं कि आज इस रस्म में तो जी भरकर फुफा, जीजा लोगों को हल्दी लगाया जाएगा।होशियार आदमी को तो मालूम होता है। उ बचने के तमाम तरीके से लामबंद रहता है। जबकि नवका पहुना लोग के मुँह ही नहीं कपड़ा भी हल्दी से पीला हो जाता है।
मड़वा छवाने के बाद घर के लड़के-लड़कियाँ मड़वा को फूल, रंगीन कागज और सजावट सामग्री से सजाने में जुट जाते हैं। अब जिसकी शादी होने वाली है। उसको घर के सभी रिश्तेदार #हल्दी लगाते हैं और उन गीतों में सीता जैसी सुकुंवार लड़की का जिक्र होता चला जाता है, जो हल्दी की गर्मी भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है-
"बाबा हो जनक बाबा,धन्न रउआ बानी जी
कहिया के हरदी,संचले रउआ बानी जी
हमरो सिया बेटी, अति सुकुंवार जी
हरदी के रच बसे, जनि कुम्हलाए जी
हमरो सिया बेटी, अति सुकुंवार जी
सहलो न जाला,हरदिया के धाह जी..."
मड़वा के बाद रात को #मड़वा_भात_खाने का अलग आनंद होता है।सामान्यतः यह कचिया खाना कहलाता है। मतलब पुड़ी कचौड़ी और विभिन्न मसालेदार सब्जी की बजाए साधारण खाना होता है। उस दिन चावल(भात), अरहर की दाल और पाँच तरह की साग-सब्जी बनती है।कढ़ी-बरी, तिलौरी, चरौरी, सलाद और अचार उस स्वाद को और बेमिसाल बनाते हैं। घर की खुशबूदार घी परोसने के बाद सब खाना शुरु करते हैं।
अब क्या है कि कल से तो परिवार में सबको बहुत सारा काम करना होता है। घर-परिवार और सभी गोतिया लोगों को बारातियों की स्वागत करना होता है। इसलिए गाँव घर के रिश्तेदार और गोतिया लोगों की असली आव-भगत तो मड़वा के दिन ही होती है।
©Ajay Shukla

No comments:
Post a Comment