आज सुबह-सुबह कुछ ढप-ढप की आवाज से नींद खुली। एक तो छुट्टियों का समय, दीवाली की थकान और ऊपर से ये नींद में खलल डालने वाली आवाज। ओह! मम्मी क्या बजा रही हो? मेरा इतना कहना था कि तब तक आवाज मेरे कमरे तक पहुँच चुकी थी। दादी एक पुराना #सूप लेकर #हँसुए से उसे पीट रही थी और मम्मी एक दीया लिए हुए उसके पीछे थी।
अचानक से मुझे याद आया कि अरे! आज तो #गोधन पूजा है और इस दिन सुबह #दलिद्दर खेदने की परंपरा है, बचपन से तो देखती आ रही हूँ। पर शायद घर से बाहर रहने के कारण भूल रही थी। '#दलिद्दर_खेदना' दरिद्रता भगाने की एक प्रक्रिया है। एेसा माना जाता है कि इससे घर से दरिद्रता भाग जाती है और लक्ष्मी का निवास होता है। इसमें सूप को घर से दूर ले जाकर जला दिया जाता था, ताकि दलिद्दर दोबारा वापस न आ सके।
दलिद्दर भगाकर लिपाई-पोताई और स्नान आदि के बाद महिलाएँ गोधन कूटने जाती हैं। मान्यता के अनुसार यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व को '#भैयादूज' के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि गोधन कूटने की यह परंपरा भाइयों की मंगलकामना के लिए ही चली आ रही है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को 'शाप' (श्राप) देकर उनकी मंगलकामना करती हैं। एेसा कहते हैं कि इससे भाइयों को मृत्यु का डर नहीं होता। गोधन के मौके पर बहन द्वारा भाइयों को जी भर कर कोसा जाता है और गालियां दी जाती हैं। इस दौरान रेंगनी (एक प्रकार का पौधा) के काँटों को बहनें अपनी जीभ में चुभाती हैं।
गोधन भैया चलले अहेलिया ओह पार
गोधन भैया खेलेले शिकार... जैसे गीतों के साथ बहनें गोधन कूटना शुरू करती हैं। गोधन कूटने के लिए गोबर से चौकोर आकृति बनाई जाती है, जिसमें यम, साँप, बिच्छू आदि भी बनाए जाते हैं और उसमें, #चना, #नारियल, सुपारी इत्यादि डालकर फिर उसे डंडे से कूटा जाता है। साथ ही बीच-बीच में गीतों के बोल सुनाई पड़ते हैं-
जौरा कुटी ला, भौरा कुटी ला
जम के रात
कुटी ला जम भईया के मुदई
छव महीना दिन रात.....।
भाईयों को श्राप देकर उनकी मंगलकामना करने की यह प्रथा बहुत ही विचित्र है। इस प्रथा के पीछे एक कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में एक राजा के पुत्र की शादी थी इस मौके पर राजा ने अपनी विवाहित पुत्री को भी बुलाया था। भाई-बहन में बहुत प्रेम था। जब बहन भाई की बारात में शामिल होने जा रही थी, तब उसने लोगों को यह कहते सुना कि राजा की पुत्री ने अपने भाई को कभी गाली नहीं दी है, जिस कारण वह बारात के दौरान ही मर जाएगा। बारात जाने के रास्ते में बहन ने अपने भाई को खूब गालियाँ दीं और रास्ते में जो भी साँप-बिच्छु मिलें, उसे मारती चली। जब वह घर पहुँची,तो यमराज उसके भाई के प्राण लेने आए थे, परंतु भाई-बहन के प्रेम को देखकर वह बिना प्राण लिए लौट गए। मान्यता है कि तभी से यम द्वितीया के दिन बहन द्वारा भाई को शाप देने की परंपरा शुरू हुई।
गोधन कूटने के बाद बहनें चना और गुड़ प्रसाद के रूप में भाइयों को खिलाती हैं। गोधन के दिन दाल पुड़ी और खीर बनाने की परंपरा है। मैं तो फिलहाल इसी स्वादिष्ट भोजन का इंतजार कर रही हूँ। वैसे भी सुबह जल्दी जगने से भूख भी कुछ ज्यादा ही लगी है। आप लोग भी गोधन से जुड़ी अपनी यादों, मान्यताओं को हमें जरूर बताइएगा।
आप सबको गोधन पूजा की शुभकामनाएँ।
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