Saturday, January 9, 2021

आदिवासी दिवस

 #ठेठ_पलामू:-आदिवासी दिवस

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9 अगस्त को #आदिवासी_दिवस मनाया जाता है, और पलामू का नामकरण '#पलामू' भी चेरो जाति ने ही किया था। पलामू के कमिश्नरी का नाम मेदिनीनगर भी एक आदिवासी (चेरो) राजा के सम्मान में ही रखा गया है।
#चेरो_राजवंश का इतिहास लगभग 400 साल पुराना है। चेरो राजवंश का प्रारंभ 1613 ई में हुआ था, जो अंग्रेजों के दस्तावेज में उपलब्ध है, परन्तु मुग़लों के इतिहास में 1585 ई की जानकारी उपलब्ध है। पलामू में लगभग हर जगह चेरो जाति की व्यवस्था और उनकी प्रथाओं का असर है, गाँव #गमहेल की परम्परा और मान्यता भी उन्हीं की देन है, पलामू के लगभग सभी गाँवो में गमहेल को माना जाता है, और उनकी किवदंतियाँ कही जाती है।
चेरो जाति की एक प्रथा #डोला_शादी की भी है, जिसमे लड़का का परिवार लड़की के घर जाता है और लड़की को अपने घर ले आता है, उसके बाद धूमधाम से लड़के के घर पर ही विवाह होती है। चेरो लोग बहुत ही ईमानदार और शांत स्वभाव के होते हैं।
सिर्फ चेरो या आदिवासी ही नहीं सभी पलामूवासी चेरो राजवंश की वीरता पर गर्व करते हैं, इसी राजवंश के राजा #मेदनीराय का नाम गर्व से लेते हैं और उनके समय से ही एक कहावत प्रसिद्ध है "राजा मेदनिया घर-घर बाजे मथनिया।" इसी से समझा जा सकता है कि ये लोग कितने लोकप्रिय शासक थे।
1613 में पलामू के वर्तमान तरहसी में अमानत नदी के किनारे मानगढ़ में भगवंत राय ने चेरो राजवंश की नींव रखी थी। भगवंत राय ने रक्सेल राजा मानसिंह के परिवार की हत्या करने के बाद शासन स्थापित किया था। चेरो साम्राज्य के अंतिम शासक 'चूड़ामन राय' थे, जिनका शासन 1813 ई तक चला। सभी राजाओं के अपने-अपने वीरता किस्से हैं। चेरो राजवंश के फैलाव राजा मेदनीराय के वक्त #हजारीबाग से मध्यप्रदेश के #सरगुजा और #शेरघाटी से #लोहरदगा तक फैला हुआ था। चेरो राजाओं ने कभी किसी की अधिनता स्वीकार नहीं की थी। दिल्ली सल्तनत या फिर मुग़लों से हमेशा इनकी लड़ाइयाँ हुई, इन्हें हमेशा इनकी वीरता के लिए याद किया जाता है। इन्होंने कभी भी किसी को कर नहीं दिया। भारत के इतिहास में ऐसे बहुत से कम सम्राज्य रहे, जिन्होंने लगभग 400 साल तक राज किया हो और मुग़ल साम्राज्य उनसे कभी कर भी नहीं ले पाए।
चेरो सम्राज्य का कार्यकाल
भगवंत राय 1585-1605
अंनत राय 1605-1612
सहबल राय 1612-1627
प्रताप राय 1627-1637
भूपल राय 1637-1657
मेदिनीराय 1658-1674
रुद्र राय 1674-1680
दुर्गपाल राय 1680-1697
साहेब राय 1697-1716
रंजीत राय 1716-1722
जयकिशन राय 1722-1770
चिमनजीत राय 1770-1771
गोपाल राय 1771-1777
गजराज राय 1777-1780
बसंत राय 1780-1783
चूड़ामन राय 1785-1813
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