#ठेठ_पलामू:- आवे आम चाहे जाए लबेदा
----------------------------------------
जी, बचपन में इस कहावत का जोर-शोर से चलन था।
यह भी ठीक है कि आजकल बाज़ार में हर वेरायटी के आम मौजूद हैं। लोग खरीद कर फ्रीज मे भी रख रहे हैं। सलीके से चाकू से काटकर चीनी मिट्टी के बर्तन में परोसते हैं। मगर जो मजा पेड़ से झार के दाँत से छिल के खाने में या चूसने में है उसके आनंद की तुलना सलीके से काटे गए आम में कहाँ...
मेला मे लोग 10 रुपया में 5 राउंड राइफल चला के निशाने बाजी का शौक उतारते हैं। मगर पलामू के बच्चे तो गुलेल बाज़ी में ही शौक विस्तार पूर्वक पूरा कर लेते हैं और रही-सही कसर आम के पेड़ के नीचे ढेला लबेदा चलाने में पूरा हो जाता है और हाँ, बन्दूक पकड़ने के शौक के लिए होली में चिट चीटिया बन्दूक खूब यूज़ होता है।
अपने पेड़ से तो लोग चढ़ के बेधड़क आम तोड़ लेते हैं, मगर दूसरे के पेड़ से चुपके से आम झार लेने की बात.... जो मजा स्वयं संघर्ष कर के फल की प्राप्ति में है... जीवन के लिए प्रेरणा स्रोत है। यह लबेदा जो पलामू के बच्चे बचपन से चलाना सीखते हैं। यही कारण है कि पलामू के बच्चे आज भी गिरे हुए आम नहीं खाते, खुद झार कर खाते हैं।
5,307
People reached
864
Engagements

No comments:
Post a Comment