#ठेठ_पलामू:- अंतर्देशी और पोस्टकार्ड
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अगर बचपन के हिंदी के परीक्षा को याद किया जाए, तो सबसे महत्वपूर्ण और सियोर कोस्चन रहता था, प्रधानाध्यापक के पास फीस माफ करने के लिए आवेदन या पिताजी के पास पत्र, जिसमें किताब खरीदने के लिए पैसे #मनीआर्डर करने की बात कही गई हो। आवेदन का 2-4 लाईन तो सब कोई लिख ही देता था, पर चिठ्ठी लिखने में बहुत लोग गड़बड़ा जाते थे। अब गड़बड़ाते काहे नहीं, कभी लिखें तब न। इस मामले में हम ठीक-ठाक ही थे, हमेशा चिठ्ठी भी लिखते थे और आवेदन भी, तो अब आते हैं आज #चिठ्ठी पर ।
वैसे बचपन मे चिट्ठी हमलोग लिखते खूब थे। मामा घर दूर था और उस टाइम फोन इ सब था नहीं, तो हाल चाल जानने का इकलौता माध्यम चिट्ठी ही हुआ करता था। जब नॉर्मल हाल चाल वाला चिट्ठी लिखना होता तो, #आठ_अन्ना वाला पोस्ट कार्ड लेके आ जाते और इत्मीनान से लिख के माई के पकड़ा देते। उ पढ़ के अता-पता सही से लिखे हैं कि नहीं बता देती और फिर जा के पोस्ट ऑफिस में डाल देते। अगर कभी लंबा-चौड़ा लिखना होता, तब सवा रुपया वाला अंतर्देशी लाना पड़ता था। काहे कि उसमें जगह बहुत रहता था। उसी में दुनो भाई लोग को जगह बाँट दिया जाता था, कि एतना में तुम लिखना आऊ एतना में तुम, बाकि जगह में माई लिखती थी।
चिट्ठी भेजने के बाद जवाब का भी इंतज़ार वैसा ही रहता कि नाना को चिट्ठी मिला होगा कि नहीं, मिल गया होगा तो पढ़े होंगे कि नहीं। पढ़े तो अभी तक जवाब क्यों नहीं दिए। यही सब दिमाग में चलते रहता था और जब जवाब आता तो उतना ही खुशी होता। उधर से नाना, मौसी, मामा भी एक ही अंतर्देशी में थोड़ा-थोड़ा कर के सब के बारे में लिखते। #हैंडराइटिंग में कितना सुधार हुआ है, तो पढ़ाई अच्छा से करना और बहुत सारा आशीर्वाद। समझिए अगर कुछ बड़ाई वाला बात लिखल रहता, तब तो चिट्ठी निकाल के बार-बार पढ़ते। सब चिट्ठी सम्भाल के रखा हुआ रहता था। शायद अगर माई के बक्सा अलमारी खोजल जाए, तो अभियो सब चिट्ठी मिल जाएगा।
अभियो याद है कि एक बार गर्मी छुट्टी के टाईम हम माई साथे मामा घर गए हुए थे आऊ गाँव में पागल कुत्ता एगो लड़की के काट दिया था। उसके तुरंत बाद भईया इहाँ से चिठ्ठी लिख के माई के बोले थे कि #अनुआ (हमर घरे के नाम) के ध्यान रखने, कुत्ता-उत्ता से बचा के रखने। वैसे चिठ्ठी हमलोग के घर दो ही जगह से आता था, एगो हमलोग के नाना घर से आऊ एगो बड़की फुआ लिख के भेजती थी। ऐसे ही उस समय सब के याद रखना पड़ता था कि केतना दूर भेजना है, तो केतना पैसा के टिकट लगाना पड़ेगा।
एगो आऊ चिट्ठी रहता था, बिना टिकट के खाली पता लिख देने से चल जाता था। लेकिन जिसके पास भेजे हैं उसको चिट्ठी लेने के लिए पैसा देना पड़ता था। इसको #बैरन चिठ्ठी कहते थे। कभी-कभी मन करता सादा कागज़में लिख के खुद से कागज के लिफ़ाफ़ा बना के आऊ उसी पर टिकट #साट के भी चिठ्ठी भेज देते थे। इसलिए स्कूल में चिठ्ठी लिखने और #लिफ़ाफ़ा बनाने सिखाया भी जाता था।
आपलोग भी तो लिखबे किए होंगे कभी-न-कभी चिट्ठी, भले #विविध_भारती पर गाना फरमाइश करने के लिए ही लिखें हों, तो बस हम थोड़ा हिंट दे देते हैं, इसी बहाने आपलोग को भी अपना बचपन याद आ जाए और मन-ही-मन एकाध चिठ्ठी लिखा जाए।
पूजनीय नानाजी,
सादर प्रणाम,
हमलोग यहाँ कुशल पूर्वक हैं और आशा करते हैं कि आपलोग भी कुशल पूर्वक होंगे।
आपका प्यारा नाती
आनंद
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