Saturday, January 2, 2021

आजी का किस्सा- 01

 #ठेठ_पलामू:- आजी का किस्सा- 01

"बाघ के चिर फाड़ करे #बियारी, सिंघ खोजत-खोजत पाकल दाढ़ी"
गर्मी की छुट्टियों में अक्सर हम बच्चों का समय गाँव में ही बीतता था। रात को आँगन में #खटिया लगा कर सोने का रिवाज था। आजी के साथ जब भी सोने का मौका मिलता था, वो अक्सर कहानी सुनाती थीं। उनके द्वारा सुनाई गयी सभी कहानियाँ काफी शिक्षाप्रद होती थीं।
वास्तव में लोक कहानियों का अलग ही महत्व होता है। जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अगली पीढ़ी तक पहुँचती है। वैसे नीचे लिखी कहानी को बचपन में सुना था। पूरा तो नहीं याद है, लेकिन बहुत हद तक कुछ-कुछ याद है। हम सभी का ये फ़र्ज़ बनता है कि इन सभी कहानियों को एक जगह समेटा जाए और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाए, वरना वाट्सएप और यूट्यूब की भ्रामक जाल में ये सभी कहानियाँ लगभग विलुप्त हो जाएँगी।
सच कहा जाए, तो पलामू का यह दुर्भाग्य ही रहा है कि इधर-उधर और अगल-बगल से हम ज्यादा विकास जरूर करते दिख रहे हैं, लेकिन यह भी हकीकत है कि अपनी मिट्टी की महक को बचाने में हम बहुत हद तक नाकाम रहे हैं। खैर! आइए एक छोटी-सी शुरुआत करते हैं। और, हाँ! आप सभी से विनती है कि अगर आपके पास भी बाबा-आजी की ऐसी कहानियाँ हैं, तो हमारे साथ जरूर शेयर करें। जिससे आने वाली हमारी पीढ़ियाँ इसका फायदा उठा सके। तो आइए! #आजी के शब्दों में इस कहानी को पढ़ें-
"एगो बकरी रहे ढेरे नटखट रहे, उ चरे निकलल रहे, चरत-चरत साँझ हो गइल, आउ बन में भुला गइल। चरवाहा के भी ध्यान नाई रहल कि उ बन में छूट गइल। ढेरे नटखट रहे त ढेरे ले दूर निकल के, उहें बाझ के #बईर के पतई खाए में रह गइल। बसन्त ऋतु रहे से सउँसे हरियर रहे, से उ समय के ध्यान भी नई देलक।
अब बकरिया लउटे लागल, त ओकरा सबसे पहले एगो सियार के झुंड मिललक। ओकरा में सियार के मुखिया ओकरा से बोललक कि आज त तोरा खा जाइब हम। #बकरिया डेरा गइल, लेकिन रहे त उ तेज, उ ओकरा जवाब देलक कि, "बाघ की चिरो फाड़ो करो बियारी, सिंह खोजत-खोजत हमर पाकल दाढ़ी" एतना सुनलन जे सियरवा सब, तुरंत सब सोचलन कि इ तो बड़का बदमाश बा, जे बिहाने-बिहाने बाघ के खा ला, उ तो हमनी के ऐसे ही चबा जाई, आउ एकर दाढ़ी भी सचो के लटक गइल बा पक के, जरूर ई ढेरे ताकतवर होइ, बस उ सब डेरा के भाग गइलन।
अब ओहनी के का पता कि बकरी के दाढ़ी होइबे करलाS। अब बकरिया फिर तनी-सा आगे बढ़लक त, फिर ओकरा एगो बाघ मिललक फिर उ बकरिया डेराईत-डेराइत बोललक कि "बाघ के चिरो फाड़ो करो बियारी, सिंघ खोजत-खोजत हमर पाकल दाढ़ी।" बघवा सोचलक की 4-5 घण्टा में एकर बियारी के टाइम होइए जाई से भागे में ही भलाई बा, नहीं तो ई हमरे नश्ता कर लिहि। अउर शेर त पलामू के जंगल में नइखे से हमर बचे के उम्मीद भी नइखे, आउ बिहान हो गइल ऐसे ही त बकरिया फिर अपन घर आ गइल, लेकिन अब उ किरिया खा लेलक कि अब अकेले कनहूँ नाइ जाइब बईर खाए के चक्कर में।"
अब इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि बच्चों को अकेले भटकना नहीं चाहिए, नहीं तो मुसीबत भी घेर लेती है और अगर कॉन्फिडेंस(आत्मविश्वास) से सामना किया जाए, तो बड़ी-से-बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है।
@Sunny Shukla
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