Saturday, January 9, 2021

गर्मी, बुखार, और लू

 गर्मी, बुखार, और लू: Dr

Govind Madhaw
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भारत में गर्मी का आगमन हो चुका है। डॉक्टरों के लिए गर्मी को ‘शादी का मौसम’ और बारिश को ‘हनीमून सीज़न’ कहा जाता है। कहने का अर्थ यह है कि अपने देश में लोग सबसे ज्यादा इसी दौरान बीमार पड़ते हैं। आग से जलने की चर्चा हमने पिछले अंक में की थी, आज चर्चा गर्मी के अंदरूनी प्रभाव पर।
सबसे पहले यह समझते हैं कि हमारा शरीर भी एक यंत्र जैसा ही है। इसके कल-पुर्जों को ठीक से कार्य करने के लिए एक स्थिर तापमान की आवश्यकता होती है। यह नॉर्मल बॉडी टेंपरेचर कहलाता है, यानी 35.5 से 37.5 डिग्री सेल्सियस। अगर तापमान इसके नीचे गया तो शरीर का इंजन ठंडा और ऊपर गया तो इंजन गर्म।
हम जब भी अपने मांसपेशियों से ज्यादा काम करते हैं तो शरीर में ऊष्मा ऊर्जा का उत्पादन बढ़ जाता है। ठीक उसी तरह जैसे मोबाइल फ़ोन या कोई अन्य उपकरण ज्यादा चलने पर या गर्म वातावरण में रखा रहने पर गर्म हो जाता है। अब सोचिए कि अगर आपके मोबाइल को धूप में या भट्टी के पास बहुत देर रख दिया जाए तो क्या होगा? क्या उसके चिप में लगे सेमीकंडक्टर विद्युत् तरंगों का सही प्रवाह करा पायेंगे? पदार्थों के विद्युतचुंबकीय गुणों की स्थिति यथावत बनी रहेगी? गर्म होने पर ठीक यही परिस्थिति हमारे शरीर के संकेत तंत्र (सिग्नलिंग सिस्टम) की होती है। तंत्रिकाएँ (nerves) बिजली के तार की तरह दिमाग और पूरे शरीर के बीच संकेतों का आदान-प्रदान करती हैं।
कुछ सूचनाएँ वायरलेस भी होती है। यहाँ कुछ संवाददाता (मेसेंजेर) रूपी मॉलिक्यूल किसी चिट्ठी की तरह, ख़ुद यात्रा करते हैं। तापमान में बदलाव होने से इनकी संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। तो इस स्थिति को पूरे देश में संचार साधन ठप्प होने की तरह से समझ सकते हैं। अगर चिट्ठी में से स्याही गीली हो कर अर्थ का अनर्थ कर दे तो?
लेकिन मशीन की तरह हम अपने शरीर को ठंडा होने के लिए स्विच ऑफ तो नहीं कर सकते हैं न! इसीलिए हमारे मस्तिष्क के एक हिस्से में जिसे हाइपोथैलामस कहते हैं, वहां एक सेन्सर लगा होता है, ठीक AC के सेन्सर की तरह। जैसे ही शरीर का तापमान ऊपर नीचे हुआ, यह सेन्सर मस्तिष्क को सूचित करता है। अब उपाय की बारी मस्तिष्क की होती है। शरीर का तापमान घटा कर सामान्य तक लाने के लिए दिमाग ने अपने सहयोगी ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम को कुछ शक्तियाँ दी हुई है। जैसा कि सहयोगी के नाम से ही स्पष्ट है - 'ऑटोनोमस' यानी स्वायत्तता प्राप्त। यह स्वायत्त तंत्र छोटी-छोटी बातों के लिए बार बार दिमाग को परेशान नहीं करता है बल्कि कुछ निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र एवं सक्षम है। तापमान के अलावा भूख, गुस्सा, नींद, धड़कन, यौनाचार, रक्तचाप और साँसों की गति जैसे मुख्य काम भी इसी सिस्टम के जिम्मे है।
तापमान को कम करने के लिए हमारे शरीर में एक कूलिंग सिस्टम बना हुआ है। हाइपोथैलामस को जैसे ही पता चलता है कि तापमान बढ़ रहा है, यह सिस्टम स्वतः चालू हो जाता है। सबसे पहले पसीना बहना शुरु होता है। पानी एक कूलेंट की तरह अंदरूनी तापमान को सोखकर पसीने के रूप में बाहर सतह पर लाता है। अगला उपाय है दिमाग की एक्टिविटी को कम करना, ताकि शरीर में ऊष्मा का उत्पादन कम से कम हो, साथ ही महत्वपूर्ण संयंत्र गर्म हो कर खराब न होने लगें। इसीलिए हम गर्मी में सुस्त पड़ने लगते हैं।
परन्तु बचाव के ये उपाय हमेशा कारगर साबित नहीं हो पाते। एक सीमा तक ही ये हमें गर्मी के दुष्प्रभावों से बचाए रख सकते हैं, उसके ऊपर जाने पर शरीर की बनावट और कर्यव्यवस्था चरमराने लगती है। शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। पसीने के रूप में बह बह कर शरीर से पानी ख़त्म होने लगता है। कभी कभी तो ज्यादा तापमान होने पर अन्दर का पानी सतह पर आते ही सीधे भाप बन कर उड़ जाता है, हमें पता भी नहीं चलता कि पसीना भी बहा है। ऐसी ही स्थिति गर्म हवाओं के चपेट में आने पर बनती है। लू लगने में क्या होता होगा अब आप समझ रहे होंगे। पसीना भी नहीं निकला, पानी भाप बन कर निकलता रहा इस कारण से बाहरी सतह यानि त्वचा का तापमान भी ज्यादा नहीं बढ़ा, मगर कोर टेम्परेचर यानि अंदरूनी ताप असंतुलित। हाइपोथैलामस का सेंसर भी हैंग कर जाता है, अब मस्तिष्क को समझ नहीं आता कि शरीर का तापमान बढ़ाना है या घटना है। हो सकता है कि शरीर में थरथरी या कम्पन होने लगे जो कि ठंढ में तापमान बढ़ने की एक प्रक्रिया है। कुलेंट यानी शरीर में मौजूद पानी की मात्रा में भारी कमी, पानी की कमी तो रासायनिक प्रक्रियाएँ चौपट, किडनी द्वारा गंदगी को मूत्र रूप में बाहर निकलने की प्रक्रिया बाधित। रक्त के आयतन का दो तिहाई हिस्सा भी पानी ही होता है, तो पानी की कमी से शरीर में खून के बहाव, संगठन, ओस्मोलारिटी, कार्यप्रणाली सब बाधित। खून ही समूचे शरीर को जरुरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुंचता है, तो इस तरह से सारे अंग प्रभावित होने लगते हैं। तापमान कितना बढ़ा और कितने देर तक बढ़ा रहा, इस पर निर्भर करेगा कि शरीर में कितनी गड़बड़ी हुई। पानी के साथ साथ जरुरी आयन जैसे सोडियम और पोटासियम भी बह जाते हैं पसीने के रूप में। इसीलिए पसीना नमकीन होता है। हमारे अन्दर के सभी सिग्नलिंग सिस्टम को काम करने के लिए इन आयनों की आवश्यकता होती है। इन इलेक्ट्रोलाइटस की कमी से हाथ पैर की मांसपेशियों में क्रेम्प्स होने लगते हैं। हृदय की गति बाधित होने लगती है, पेट में पाचन प्रभावित होने लगता है तो अतिसार (डायरिया) होने लगता है। दस्त से शरीर में और ज्यादा पानी की कमी होने लगती है।
अब आप समझ सकते हैं कि गर्मी की चपेट में आने से आपका शरीर किस तरह प्रभावित होता है। गर्म भट्टी के नजदीक ज्यादा काम करने वाले मजदूर, धुप में ज्यादा देर तक लगातार पसीना बहाने वाले खिलाडी और ठंडे प्रदेश में रहने के अभ्यस्त लोग जो अभी अभी गर्म प्रदेश में आये हैं - ये सब खतरे में पड़ सकते हैं। अगर किसी अन्य कारण से भी आपके शरीर में पानी और लवण - इलेक्ट्रोलाइटस की कमी होती है तो आप खतरे में हैं।
गर्मी से उत्पन्न होने वाली बीमारी को ही ‘हीट-स्ट्रोक’ कहते हैं। जबकि किसी भी कारण से शरीर के तापमान बढ़ने को हाइपरथरमिया, फीवर या आम भाषा में बुखार (या ज्वर) कहा जाता है। ध्यान रहे कि ज्वर के अनेक कारण हैं जिनमे संक्रमण (इन्फेक्शन) और सूजन (इन्फ्लामेशन) सबसे मुख्य हैं।
अभी तक आपने समझा शरीर की ताप-नियंत्रण प्रणाली, उसमे होने वाली गड़बड़ी के ‘कारण और प्रभाव’ को। कोई भी व्यक्ति जो रिस्क पर है, उसमें ऊपर बताये लक्षणों पर गौर करते हुए हीट-स्ट्रोक को शुरुआत में ही पहचान कर हम बड़े खतरे से बच सकते हैं। आपने यह भी समझ लिया कि हमें गर्मी के हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिए पानी और नमक कितने आवश्यक हैं। अब आप यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हीट-स्ट्रोक से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए।
लेकिन फिर भी यदि आप गर्मी की चपेट में आ ही गए तो क्या करना चाहिए? शरीर को ठंडा करने के लिए त्वचा को बर्फ या ठंडे पानी से पोंछें। कोर टेम्परेचर को कम करने के लिए ठंडा पानी पियें। इलेक्ट्रोलाइटस की कमी को पूरा करने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन सोल्यूसन यानि ORS का प्रयोग करें।
‘कितना पानी पीना है?’- यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। जटिल गणित से बजते हुए एक सरल सूत्र आप लोगों को बता रहा हूँ जो कि अन्य रोगों में भी एप्लीकेबल है। हमें रोज़ इतना पानी पीना चाहिए कि दिन भर में हम करीब डेढ़ लीटर पेशाब कर सकें।
अब सबसे जरुरी बात - इस आलेख को मैंने इस उद्देश्य से लिखा है कि आप बीमारी को बेहतर तरीके से समझें और उससे बचाव के उपाय कर सकें। मगर स्थिति जब भी सिवियर हो, कृपया प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह शीघ्र लें, अन्यथा रोगी की जान खतरे में पड़ सकती है।
(अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका सेतु के अप्रैल 2018 अंक से साभार)
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