#ठेठ_पलामू:- "खुशी के रंग होली के संग"
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बसन्त पंचमी (सरस्वती पूजा) के ख़त्म होइते यानी मूर्ति #भसान (विसर्जन) के समय से ही बसन्ती बयार आऊ रंग के खुमार सब लईका जवान #सयान बूढ़-ठूढ़ सब पर चढ़ जाला। बसन्त मौसम तो मौसम के राजा होखबे करेला जेकर स्वागत सरस्वती माँ के प्रतिमा विसर्जन के समय उड़े आऊ लागे वाला अबीर गुलाल से करल जाला आऊ एहि समय से होली के भी आगाज हो जाला।
होली मने हुड़दंग, त्योहार कम और त्योहार के श्रृंखला जादे लागत रहे, काहे कि एहमें एगो सिर्फ रंग खेले वाला ही काम न रहे, बल्कि अनेक काम क्रमानुसार होवत रहे। ओइसे तो हमर गाँव में शिवजी के मन्दिर में हर मंगलवार आऊ शनिवार के संध्या आरती आऊ भजन के परम्परा बा, पर जब से फ़ागुन चढ़ जईतक तो उ भजन में आखिर में होली गवाए के शुरुआत हो जात रहे। ठेठ ग्रामीण आऊ गरीब परिवेश के कारण गाँव के जादे लोग खेतिहर आऊ मजदूर हलन, जे दिन भर के काम के बाद शाम में संध्या भजन में जरूर जुट हलन।
होली आवत-आवत खेत से रहर, मसूर खरिहान में पहुँच जात रहे, आऊ गेहूँ, बूट, जौ भी तैयारी में रह हलन, पानी पटौउनी के ज्यादा साधन रहे नई तो #टाँड-टाँड़ीहन में जादे रहर, तीसी बुनात रहे, जे कटे के बाद चारों ओर खुला-खुला नजर आवत रहे । होली से हफ्ता भर पहिले से ही गाँव के लईकन छोट टीना के डब्बा काट के ओहमें तार बांध के डिब्बा में चारों ओर छेद करके ओहमें #चिड़चिड़ी (केंदू पत्ता) के लकड़ी के बोकला डाल के आग डाल के साँझ होइते खूब होलरी धुनाये के कम्पटीशन करतन जे में ओह में से निकलेवाले चिंगारी से जरे-खोरे के भी डर बनल रहत रहे।
अब जइसे-जइसे होली नजदीक आवे लगतक तो गाँव में दू दिन मंगर आऊ शनिचर के बजार लगेला, जे में से बम-पटाखा (मुर्गा बम) फेमस रहे, ओकर पूरा पॉकिट खरीदे के तैयारी रहतक काहे कि एक पॉकिट में पूरा 100 बम रहत रहे, जे ओह समय ला बहुत होख हलक, #छुरछुरी (फूलझड़ी) ,#टिकुलिया बम (चिट्चीटिया) अाऊ ओकर पिस्टल, सुतरी बम, रंग, अबीर (गुलाल) बाजार में चढ़े तो अईसन मन करे कि सब किन लेऊँ पर पईसा रहत ना रहे कि मन के इच्छा पूरा होखे बस दादा एक पॉकिट बम लइतन तो सब भाई-बहिन में 5-7 के हिसाब से बाँट देतन। उहे हाल रंग के पॉकिट के भी रहत रहे, पिचकारी तो किनाय के बाते न रहल तब गाँव में कच्चा बाँस काट के देसी पिचकारी आऊ परास के फूल के पानी में भिंगा के लाल रंग बनाव हली आऊ ओकरे से रंग खेले के कम्पटीशन होवत रहे।
अब एक-एक दिन बीतते-बीतते होलिका दहन के दिन आ गईल, हमनी के गाँव में ओकरा #सम्मत बोल हत। ई दिन गाँव के पूरा आबादी चार ग्रुप में बँट जा हलक सबसे पहिले बच्चा ग्रुप, फिर नवहा (पढ़े-लिखे वाले लइकन) ग्रुप, फिर चाचा ग्रुप आऊ लास्ट बाबा (दादा) ग्रुप, होली में सब ग्रुप के अापन-अापन ढंग आउ काम होखत रहे। शाम होइते होलिका दहन ला सब कोई अापन-अापन घर से लकड़ी चिपड़ी-गोइठा सम्मत वाला जगह पर जमा करके आव हलन, लेकिन नवहा लईकन में एगो ई कम्पटीशन रहत रहे कि सम्मत के आग के लपट दूर दुसरो गाँव तक देखाय के चाही आउ ओकरा खातिर हमनी घर-ढाबा (ओसरा) खरिहान में रखल खाटी-माची, कुर्सी-टेबुल,हर-जुवाठ जे भी देखाइत चोरा के सम्मत में लुका देव हली।
रात होइते सम्मत के समय सब घी गुड़, धूप, बत्ती ले के सब पहुँचतन आऊ एगो सेमर (सेमल) के 10-12 फिट के डाल काटल जईतक, जे होलिका के प्रतीक होखत रहन आऊ ओकरा बीच में रख के चारों ओर से लकड़ी गोइठा से ढंकल जा हलक फिर पूजा करके सम्मत में आग लगावल जा हलक। सब लोग पूजा हवन के पाँच-पाँच लकड़ी हाथ में ले के ओकर परिक्रमा करतन आऊ हर फेरा में एक लकड़ी आग में डलते जईतन। एह तरी पाँच फेरा लगउला के बाद सब सम्मत के घेर के खड़ा रहती आऊ सब इहई अपन-अपन बम पड़ाका खूब फोड़ती। जब लपट कम हो जाईत, तब बूट के झँगरी आऊ गेहूँ के बाली के उहे आग में पकावल जा हलक जेकरा होरहा या अगजा कहल जा हलक मेन प्रसाद होइतक। अब सबसे अंत में सम्मत वाला लकड़ी जेकरा हमर गाँव में राजा जी कह हलन फरसा से काटल जईतक आउ सब सम्मत के राख के टीका लगा के होरहा प्रसाद लेके घरे आ जईती। साथ ही सम्मत के धुँवा से बुजुर्ग लोग अगले साल के बारिश आऊ फसल कइसन होई ओकर अनुमान लगाव हलन की भंडार कोने धुँवा गईल मतलब अगला साल सब बढ़िया रही।
अब रात गुजरते बिहान होइते हम नवहन के होली के शुरुवात हो जा हलक खूब धमा-चौकड़ी आऊ जोर-जबरदस्ती वाला होली मतलब राख गोबर कीचड़ कालिख वाला होली, खोरी के धुर आउ नली के कीचड़ ई दिन सब साफ हो जाईत रहे। खास करके एकर जादा प्रयोग ओकर पर होखत रहे, जे एहसे दूर भाग हलन। गाँव के नया दामाद जी लोग के विशेष स्वागत होखत रहे, जबरदस्ती उनका हौज में या नाली में पटक के।
11-12 बजे ई होली चल हलक ओकर बाद सब सम्मत के राख ले के नदी जईती आऊ नहा धो के शिवजी के मंदिर में जा के उनपे राख चढ़ा के आवे के बाद अब रंग गुलाल वाला होली शुरू होवे वाला रहे। सबसे पहिले अबीर गुलाल ले के मंदिर जा हली शिव जी के गुलाल चढ़वते ही होली के शुरुवात होइतक। फिर सब बड़-बुजुर्ग, माँ-बाबूजी के गोड़ में अबीर रख के आशीर्वाद लेइती। ई बीच में बच्चन के होली चालू रहतक खूब बाल्टी में रंग घोर के बाँस के पिचकारी से रंगईत रहतन सबके।
क्रमशः
@राकेश भारती गोस्वामी

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