Saturday, January 2, 2021

महतो बाबा

 #ठेठ_पलामू:- महतो बाबा

मजदूरों का दिन यानी जर, जंगल और जमीन का दिन, मगर उस प्रदेश का क्या जो सदियों से अभावग्रस्त रहे हैं? वो क्षेत्र, जहाँ गृहस्थ जीवन मतलब खुद खेत में हाथ बँटाना, खुद कोड़ी चलाना, बिहन निकालना या मोटरी ले जाना रहा हो। फिर कैसा संभ्रांत और कैसा सर्वहारा वर्ग? क्या बिना वर्गों में विभाजन के कोई समाज नहीं बन सकता? क्या समरस, सह-अस्तित्व और अन्योन्याश्रय संबंध जैसी अवधारणा किसी समाज में संभव है? अगर ये सवाल आपके भी दिमाग में है, तो आइए आपको इसका जवाब ढूंढने में मदद करते हैं।
2 दिन पहले मजदूर दिवस था, सोचे तो थे कि उसी दिन लिखते पर यहाँ अपना मजदूरी चल रहा था, तो टाईम नहीं मिल पा रहा था। मजदूर शब्द सही कहें तो किताब में पढ़े हैं, चाहे बाहर आने पर दूसर के मुँह से सुने होंगे। काहे कि गाँव में छोट चाहे बढ़ काम हो तो सब भईया, चाचा, बाबा ही लोग काम करते थे, इसलिए मजदूर का मतलब आज तक बुझैबे नहीं किया। हाँ, आज कल जब फोटो-शोटो पोस्ट होता है, तो देख के याद पड़ता है कि अच्छा घरे जे गाँव के चाचा बाबा ई सब काम करते थे, उहे लोग के आजकल के फैशन में मजदूर कहल जाता है। तो चलिए आज हम मजदूर से नहीं अापन महतो बाबा से भेंट करवाते हैं।
जैसे हर परिवार में अलग-अलग परमानेंट सदस्य होते हैं, वैसे ही हमारे #पलामू या कहिए मगह में हर घर में एक #हरवाहा होते थे । वैसे ही हमारे घर में हरवाहा के नाम पर थे - #महतो_बाबा। अब आगे बढ़े उससे पहिले हरवाहा के मतलब समझ लें। हर मने हल और वाहा मने चलाने वाला। मतलब घर का वैसा सदस्य जो हल चलाना जानता हो। कहने को तो ऊ हमारे घर काम करते थें, पर परिवार के एक सदस्य की तरह रहते थे।
सुबह सुरुज उगते घरे आ जाते थे। अापन गाय-बैल के निकाल के मुँह-हाथ धो के रेडी रहते। अब ओतना भोरे-भोरे पहिले गैस वाला सिस्टम तो रहता था नहीं, इसलिए रात में ही खाना बनाते समय उनके लिए अलग से 4- 6 ठो रोटी सब्जी और अगर कुछ स्पेशल बना हो तो ऊ भी उनके लिए रखा जाता था। उतना करने के बाद ही आगे फिर खाना बनता तो 9-10 बजे फिर से खाना खाते थे। अगर खेती-बाड़ी के दिन रहा, तो उसके बाद ऊ निकल जाते खेत पर, फिर हमीन लईकन चाहे बड़हन जे रहता ऊ #लुकमा #कलेवा ले के खेत-खरिहान में जाता था। जब तक ऊ रहें, तब तक खेत-बारी का टेंशन किसी को नहीं रहता था। कहाँ कब बिहन करना है, पानी पटाना है, रोपनी खोजना है, कटवाना है सब के जिम्मेदारी उनके पर ही था और अगर उनका ई सब काम में कोई दखल अंदाजी करता तो गोसाते भी थे।
पर हमलोग के तो ऊ सब से मतलब रहता नहीं था। कभी-कभी लुकमा पहुँचाने का मौका मिलता, तो उछलते-कूदते पहुँच जाते काहे कि हेंगा पर बैठने का मौका उन्हीं से मिलता था। ऊ खड़ा हो जाते हेंगा पर गोड़ फैला के और हम आराम से उनकर दुनो गोड़ पकड़ के बैठ जाते थे। भले अब हवाई जहाज के #पायलट के काबिलियत पर शक ही रहता है, पर उनकर गोड़ पकड़ने के बाद गिरेंगे नहीं इसका पूरा भरोसा रहता था। हाँ, पर हर जोतते समय बीच-बीच में गरियाते बहुत थे बैलन के। एक बार तो घरे आ के बाबा से शिकायत भी कर दिए थे उनका इसी बात के लिए। तो बाबा उन्हीं से मेरे सामने ही पूछ दिए कि- "काहे बैलन के गारी देव हहुँ गया। आनंद केशव पूछैत हलव। तब बेचारे समझाएँ कि बैल लोग भी उनका भाषा समझता है और ऊ भी बैल लोग का समझते हैं। इसीलिए न भूख-पियास सब का ख्याल भी रखते हैं और हर जोतते समय दुलार-प्यार के साथ-साथ गरियाते भी हैं।"
ख़ैर ई सब तो उनके और गाय-बैल के बीच के बात था, पर अब आते हैं हमलोग और उनके बीच का बात पर। हम अापन जिंदगी के कम-से-कम 4-5 शिवरात्रि के मेला तो उनकर कान्हा पर बैठ के ही गए होंगे। घर से 3 किलोमीटर कान्हा पर टाँग के लेके जाना और लेके आना समझ सकते हैं। जे भी तनी-मानी आलू #कोड़ने, कोड़ी कुदारी चलाने उन्हीं के साथ सीखे हैं। आज जो खाना बनाने का एतना शौक रहता है। पहला बार उन्हीं के लिए पूड़ी छान के शौक चढ़ा था। #खरिहानी में जा के पुरा के #गांज पर खेल-खेल के सब भरका देते तनी-मानी हमलोग पर गुस्साते भी पर जइसे ही पापा-चाचा गुस्साने लगते, तो तुरंत कहते - "अरे जाए दियई अब रेंगा हइये हथी तो खेलबे न करतथीं।"
बियाह-शादी, मरनी-जीनी, सुख-दुःख सब में हमलोग के यहाँ कोई-न-कोई नेग बना हुआ है, जिसमें हरवाहा के लिए अलग से कुछ-न-कुछ होता ही है। खेती-बाड़ी करते तो थे, पर साल भर सपरिवार खाने-पीने के अलावा अलग अनाज, हर पर्व त्योहार में उनके लिए पर पकवान। बर-बीमारी में पूरा जिम्मेदारी हमारा ही होता था। खेती बाड़ी नहीं भी रहता, तो बाबा उनको कहते कि बस तूं आ जाईल कर घरे घूमते-फिरते और उसके लिए भी उनको अलग से पैसा मिलता था। बाद में ऊ बूढ़ा गए और हमलोग बढ़ हो गए, पर तब भी जब घरे जाते और उनको पता चल जाता, तो तुरंत आ जाते मिलने। दवा ये सब खत्म रहता तो हक से कहते भी कि ई लान दिह ऊ लान दिह। भैया के डॉक्टर होने पर उनका भी बीपी का दवा स्टार्ट कर दिए थे, घुटना में दर्द रहता तो उसके लिए भी कुछ दवा चल रहा था। तो 4 -5 महीना के दवाई ला कर देना हमर ड्यूटी रहता था।
तो शुरु से अकालग्रस्त होने के बावजूद भी हमारे यहाँ कभी किसी हरवाहा को मजदूर नहीं समझा गया। उसका शोषण नहीं किया गया, बल्कि उसको एक परिवार के सदस्य के जैसा सम्मान मिला और उसके साथ-साथ उसके पूरे परिवार को अपना परिवार समझा जाता था। लगभग दु साल पहिले महतो बाबा हमलोग को छोड़कर चले गए। आज उनका बेटा हमलोग के यहाँ हरवाहा तो नहीं है, पर हमलोग के बण्टेदार जरूर है और अभी के टाईम में हमलोग के तुलना में ज्यादा ही धान #पैक्स में बेच के कल ही आया है।
ये तो मेरे महतो बाबा थे। मेरे ख्याल से लगभग-लगभग हर घर में ऐसे कोई-न-कोई महतो बाबा जरूर रहें होंगे। जिनका नाम भले अलग रहा हो, पर खासकर हमारे उम्र या उससे पहले के लोगों की जिंदगी में अलग स्थान रखते होंगे।
©Anand Keshaw
आनंद केशव " देहाती "
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