Saturday, January 2, 2021

भोज के दिन कोंहड़ा रोपना

 #ठेठ_पलामू:- भोज के दिन कोंहड़ा रोपना

लईका से घर में ई कहावत सुनते आ रहे हैं। बात-बात में सब कह देते हैं - "आंय हो भोज के दिन #कोंहड़ा रोपबे तो कइसे होतऊ।" इसका मतलब हमको भी उहे पता था, जे आपको पता है कि किसी काम के लिए तर तैयारी पहिले से कर के रखना चाहिए। अंतिम समय में सब मैटर गड़बड़ा जाता है। बात भी सही है अब सब चीज तुरंत तो किया नहीं जा सकता है, तो तैयारी तो पहले से करना पड़ेगा न।
पर दु गो बात हर समय तंग करते रहता था कि आख़िर एतना आईटम खिलाया जाता है भोज में तो सब कोंहडे़ के उदाहरण काहे देता है। दूसरा अब आदमी जान रहा थोड़े न है कि कवन दिन #भोज होगा आऊ मने कोई पहिले से मना दना के रखेगा कि हमर घर भोज हो आऊ कोंहड़ा बनाना होगा। अब है पलामू के भोज कहने से दिमाग मे केकरो मरला पर खिलाये जाने वाला #ब्राह्मण भोजे न दिमाग में आता है और उसमें कोंहड़ा बनने का नियम भी है ।
इसलिए कहावत का मतलब बुझा गया कि काहे कहा गया था। तो पहिला बात कि भोज मने कोई भी आयोजन में खिलाया जाने वाला समूहिक खाना से है। खैर ई तो रहा बताने का बात लेकिन भाई अब केतनो समझा ले भोज कहते दिमाग में आएगा तो उहे वाला भोज। दूसरा बात बाकि साग सब्जी जो है न उ लगभग मिल जाता है हर सीज़न में और उ सब का न भंडारण कर के रखा नहीं जा सकता है। पर कोहड़ा, रक्सा/भतुआ ई सब ऐसा आईटम है, जो कि आदमी घरे जमा कर के रखता था। ई सालों भर तक अगर रख दिया जाए, तो भी खराब नहीं होता था।
पहले लगभग गाँव में घर के छप्पर पर कोहड़ा, भतुआ के लर रहबे करता था। आदमी जब तक निकलता तो तोड़-तोड़ के खाता पर साथे-साथे बड़ा-बड़ा देख के 8-10 ठो कोंहड़ा के पकने के लिए छोड़ दिया जाता था। जब बढ़िया से ऊ पक जाए, तो उसको घरे टाँग के रख दिया जाता था। ऐसे ही #भतुआ के भी रख दिया जाता था। अभियो गाँव मे जाइए, तो केकरो न केकरो घर मिलिए जाएगा। अदौरी पारने के लिए घरे केतना बार दादी भेजती थी हमको कि, "जो तो चियाँ फलना चाची घर कहले हलन भतुआ देवेला, लेले आव तो #अदौरी पारेला बा।"
घर के बगल में एगो दादी के गोई भी थे #मिनवा के माई, बेचारी अकेले रहे वाला आऊ उनकर पूरा #छप्पर पर कोंहड़े फरल रहता था। बाद में पका के रखती भी थी। बीच-बीच में ला के देते रहती थी।
तो पूरा बताने का मतलब ई था कि हमारे यहाँ शुरू से ही भीड़-भाड़, आफत-बीपत के लिए अन्न भंडारण के साथे-साथे सब्जियों के भंडारण का भी प्रावधान रहा है। और यही सब कारण था कि सब भोज के दिन कोंहड़ा रोपाता नहीं था। अगल-बगल ना तो घरहीं से जुगाड़ कर लेता था।
जो गाँव में रहते हैं उनसे भी कहेंगे और जो गाँव में घर छोड़ के आ गए हैं उनसे भी कहेंगे ई सब लगाने में बहुत मेहनत नहीं करना पड़ता है, लगा के छोड़ दिया कीजिए। चोरी-चमारी करने पर भी अगर 4-5 गो बच गया न तो अभी जईसन हालत में 15-20 दिन तो कोंहड़ा अकेले सम्हाल दे।
हमहुँ इहाँ #अमरीका में लॉकडॉउन में फँसल हैं, तो गए सब्जी लेने डरते-डेराते। अब कवन सब्जी लें कि फिर जादे दिन टिक भी जाए आऊ जल्दी मार्केट आना भी न पड़े। तब बस दिख गया हरियर वाला कोंहड़ा। हरियर कोंहड़ा तो मर-मसाला देके एक नम्बर सब्जी बनता ही है। पर जे मजा पकलका के खाली मेथी के फोरन पर थासल सब्जी बनता है उसमें है न कि का कहें। उसके साथ भात मिल जाए न, तो समझ लीजिए भर थरिया चाँप लेंगे इसमें में कोई दु मत नहीं है। आऊ तो आऊ इसका #खोलकोईया के तनी मोटे-मोटा छिल के निकाल के भुंजिया भी मस्त लगता है। बहुत लोग तो दाना के भी भुंज के खाते हैं। तब अब का जाइए अगर ग़लती से कहीं बाजार में मिल जाए, तो उठा के लाइए, बनाइए, खाइए और इत्मिनान से सुतिए।
ई कोरोना बीमारी फैल रहा है और सबसे जादे दिक्कत इससे बूढ़े-बुजुर्ग के होने का खतरा है। तो ईहे कहेंगे बच के रहिए, सावधानी से रहिए न तो का पता फिर घर ही कोंहड़ा के जरूरत न पड़ जाए।
©Anand keshaw
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