#ठेठ_पलामू:- गाँव अभी ज़िन्दा है
यकीन मानिए.
गाँव अभी भी ज़िन्दा है!!!!
#ओखली_मूसल की धमक अभी भी किसी ना किसी घर से सुनाई दे ही जाती है। साथ में मूसल से धान कूटते गँवई काँच की चूड़ियों की खनक भी, और वो आँचल मुँह में दबाये पसीने से लथपथ श्यामल दंतुरित ठिठोली भी!! ननद-भाभी का मिलकर एक दूसरे को गीतों में देती मीठी गाली भी!!! कभी दूर परदेश में नौकरी करने गए पिया की याद से बोझिल झुकी नज़रों में..व्याकुल इंतज़ार लिए..विरह में व्याकुल गीत की सिसकी भी !
#लालटेन - बिजली लाइट की भसड़ के बीच भी आज भी साँझ ढले घर के दरवाजों पर मटमैली शीशे वाली लालटेन जल जाते हैं...घर की छोटी बिटिया की जिम्मेवारी होती है शाम होने से पहले ही शीशा साफ़ कर बत्ती ठीक कर लेने की.. और साँझ होते ही उसे जलाने की भी। थोड़ा सा भी देर होते ही बूढ़ी दादी के टूटे दाँत के बीच से ताने और मीठी गाली की खेप आ जाती है..इसलिए इसमें कोई देरी ठीक नहीं होती..नही तो लक्ष्मी मैया रूठ जाएगी !!अंधेरा होते ही हाथ पैर धोकर लालटेन को घेर कर बच्चे बैठ ही जाते हैं किताबों का झोला बस्ता लेकर!! स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़कर सफल होने वालों की कहानियां तो फैशन हो गया है बस... पर असली और अनंत सफलता तो इस लालटेन ने दिया है संसार को !!
#कजरौटा-कजरौटा के गँवई काजल के टीके से दादी अपने पोते पोतियों को ना जाने कितने ही नज़रों,और बीमारियों से बचा लेती है, मानो संसार का सबसे बड़ा डॉक्टर या फिर ब्रह्मास्त्र कजरौटा ही है। सरसो तेल को सेक कर बनाया गया काजल..आप पढ़े लिखे शहराती लोगों के लिए भले अन हाईजेनिक हो..पर दादी के लिए तो बच्चों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच! आँख में काजल की खूब चौड़ी मोटी परत, और माथे के किनारे पर मोटा बड़ा गोल टीका.. और फिर निडर होकर बच्चे निकल पड़े आस पड़ोस में आतंक मचाने !! अब तो शहराती फैशन गाँव में भी आ गया है.. सनीमा वाला..!! सयान होती लड़कियां गाँव में भी अब आँख की ऊपर वाले पलक में काजल की लाइन बनाने लगी है !! फिर छिटदार कपड़ा पहिन कर..बड़े-बूढ़ों की नज़रों से बचती आने जाने लगी है!!
#इमलीकापेड़_चुड़ैल-आज भी हर गाँव में खेत से आती कच्ची पगडंडी पर पीढियों का गवाह मोटा इमली या बड़ या पीपल का पेड़ होता ही है, जिस पर चुड़ैल रहती है। माँ समझाती है हर बच्चे को.. साँझ में उधर मत जाना.. सफेद साड़ी, उल्टे पैर वाली चुड़ैल घेर लेती है..उसके उल्टे पैर की पायल बजती है..छम.. छम्म.. छम्म..!! गाँव मे लगभग हर किसी ने उसके पायल की छम्म छम्म कभी न कभी सुनी है! हर दूसरे आदमी से कभी वो बीड़ी तो कभी खैनी माँग चुकी होती है। एक बार तो फुलेसरी काकी से लिपस्टिक भी मांगा था चुड़ैल ने !!छुट्टियों में शहराती लड़के जब गाँव जाते हैं तो कूल ड्यूड बनकर अंधविश्वास बोलकर पहले इसे नकारते हैं, पर साँझ होते ही नानी याद आ जाती है इनकी भी पेड़ के पास जाने में!
#ब्रह्मबाबा - गाँव के छोर के शुरू होते ही, गाँव के देवता का स्थान उतने ही जागृत हैं आज भी हर जगह।गाँव में प्रवेश करने से पहले वहाँ प्रणाम कीजिये, गोहराइये.. किसी के घर बच्चा हुआ हो या किसी के भैंस ने बच्चा दिया हो..शादी हो या मुंडन..पहली पूजा यहीं।खेत खलिहान के लिए एक दूसरे पर रोज लट्ठ बजाने वाले भी यहाँ आकर एक हो जाते हैं!! ग्रामीण एकता का जीवंत स्थान !!
#उपन्यास_खाट_खैनी_ताश_गाछी-आपको आश्चर्य होगा अभी भी गाँव में कुछ युवा बचे हैं! जो आम का महीना, लुंगी में चुनौटी में खैनी चुना लपेटे, बगल में वेद प्रकाश शर्मा या केशव पंडित का उपन्यास दवाए, ताश की गड्डी लिए, गाछी में मचान या खाट पर रंग जमाते है।
#लोटाऔरखेत-सुबह सुबह...स्वच्छ भारत की लफेड़ और भौकाल से अनछुए लोग लोटा में पानी लिए खेत की ओर जाते खूब दिखते हैं। ये नही की घरों में शौचालय नही है... पर खेत में आनंद ही अलग है!!
#डीह_और_डायन- अगिन बाण मारती डायन आज भी मंतर मारती है ! नवरात्र में सफेद साड़ी पहनकर आधी रात में नाचती है.. पर उसकी ओर कोई देखो मत नही तो सूरदास बन जाओगे। मरघटिया वाले डीह पर अमावस्या की काली रात में.. खोपड़ी में खून का खीर बनाकर मंतर सिद्ध करती है.. फिर आस पड़ोस के किसी बच्चे की बलि देती है !! उसकी आँखें देखी है कभी..?? दिन में भी डर लगता है उस भुतहा आँख से !!
गाँव स्वयं में एक जीवन है.क्या क्या लिखा जाए!!
कही शादी ब्याह की तैयारी में डूबे लोग.
कहीं एक इंच जमीन के लिए झगड़ते लोग.
कहीं मोदी और सोनिया को समान रूप से गरियाते लोग.
कुल मिलाकर आधुनिकता की झूठी लफ़ेड़ से बचे
अपनी ही दुनिया में मस्त गाँव अभी भी ज़िन्दा है।
और एक बात कहूँ???
पता नहीं क्यों अब गाँव, गाँव की गँवई कथा, अंधविश्वास, लालटेन, चुड़ैल, ब्रह्म बाबा, लोटा, कजरौटा, मूसल सब ज्यादा सच्चे और अच्छे लगते हैं.
शहरी बनावट और बेदिली से भरी ज़िंदगी की तुलना में।

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