#ठेठ_पलामू:- सगखोटनी
बर्फीली बयार में लहराती #लहरिया_लूगा के साथ #खिड़कीदार बाजु वाला झूला, भर हाथ कुटन वाला चुड़ी, गर्दन में चाँदी का मोटा सिकरी और उसमें झूलती काली डोरी वाली चाभी, #बनफूल के तेल से सनी और रंगीन फीते की सहायता से कमर तक पहुँचती चोटी, चोटी को सहारा देता चाँदी का चढ़ौवा बालपिन साथ ही भर माँग पियर सेनुर, लिलार पर चाँद-सी चमकती टिकुली, कान में कर्णफूल और नाक में #छुछिया या लोलो और पैरों में चलानी पाजेब पहन जब एक साथ दर्जन भर औरतें डलिया, कपडे़ का एक चौकोर टुकड़ा और #हँसुली लिए खेत की पगडंडियों पर निकल जाएँ, तो स्वयं प्रकृति को भी उनसे ईर्ष्या होने लगे। लता-सी लचीली कमर, हिरनी-सी चाल, श्यामल चेहरे की वो प्राकृतिक चमक और उसपे भी ऐसी ठहठहाती हँसी, जिसे सुन कर बादल भी शरमा जाए।
चौकोर कपडे़ को कमर में बाँध कर सामने से कपड़े के दोनों छोर को उठा कमर में खोंसते हुए बड़े ही कलात्मकता से थैला तैयार कर हँसुली लिए जब साग के खेत में प्रवेश करती हैं, तो अनायास ही साग अगोरनिहार के मुँह से प्रस्फुटित हो उठता है-
"ए सगखोटनी तू का लगबे
भइया संग रहबे भउजाई लगबे..."
ऐसी ही प्यार भरी तो कभी-कभी बनावटी गुस्से वाली गाली सुनने के बावजूद सभी साग खोटने वाली औरतें मुस्कुराती खिलखिलाती दस मिनट में पूरा खेत साफ़ कर के निकल जाती हैं, बिल्कुल किसी मंझी हुई जादूगरनी-सी।
खेत किसका है, मालिक कौन है, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और पड़े भी क्यों? साग खोटना कोई पाप तो नहीं। साग खोट कर वे किसी को भी तो हानि नहीं पहुँचाती, बल्कि साग खोटने से तो पौधों को लाभ ही है। उनमें नई-नई कोंपले निकलेंगी, फसल की पैदावार अच्छी होगी। अप्रत्यक्ष रूप से तो उन्होंने फसलों का श्रृंगार किया है और साग खोटने के पीछे उनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि शाम को लौटते समय उनके खजाने में इतना साग हो, जिससे दो साँझ आराम से गुजारा हो जाए। उनके खजाने में आपको बूट, खेसारी, #बथुआ, सुसुनिया(बनबूट), झुनखुन, चौलाई, सरसों, मेथी और भी न जाने कितने ही प्रकार के साग दिख जाएँगे।
साग खोटने वालियों का भी अपना एक प्रकार है। पहले नम्बर वाली थोड़ी खतरनाक हैं, वे न दिन देखती हैं न रात और मौका मिलते ही जड़ी-सोर से साग को कबार देती हैं। इनसे साग बचाना बहुते मुश्किल है। इनके पकडे़ जाने पर गाँव में दंगल भी हो जाता है।
दूसरे नम्बर पर मनमौजिया सगखोटनी हैं, जो #अल्हड़ता से गालियाँ सुनते हुए घूम-घूम कर साग खोटती हैं। हँसी ठिठोली करती है और साथ-ही-साथ गुनगुनाती हैं-
"आजु बथुइये खोटले आवेके
चल ना सखिया....."
तीसरे नम्बर पर सबसे शरीफ और ईमानदार साग वाली होती हैं, वे किसी भी लाग-लपेट से दूर रहती हैं और खेत के मालिक के आज्ञा से साग खोटती हैं और आधा-आधा बाँट लेती हैं। सागखोटनियों का अस्तित्व साग से ही है, ऐसे में अगर साग के गुणों का बखान न किया जाए, तो उनके साथ अन्याय होगा।
इनमें से कई साग औषधीय गुणों से भरपूर हैं। साग में #आयरन, कैल्सियम, विटामिन्स, एंटीऑक्सीडेंट्स, फाइबर इत्यादि अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं। पर इन सब की समझ आज के तथाकथित ज्यादा पढ़े-लिखे आधुनिक चाइनीज़ और इटालियन फ़ूड खाने वालों को नहीं है। उन्हें आभास ही नहीं कि बूट के साग के साथ भात खाने का क्या आनन्द है और सगहर किसे कहते है। पलामू में तो साग को ले कर ऐसी दीवानगी होती है कि लोग चने के साग को गर्मियों में खाने के लिए सुखा कर स्टोर कर लेते हैं, आखिर यह लू का रामबाण इलाज जो ठहरा।
अब गाँव में पाए जाने वाले एक साग 'चौलाई' को ही ले लेते हैं। गर्भ की स्थिरता के लिए मासिकधर्म के समय चौलाई के जड़ को माड़ में पीस कर पिलाने से लाभ होता है। साथ ही #स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए चौलाई किसी वरदान से कम नहीं है। बच्चों के मस्तिष्क के समुचित विकास में सहयोगी है। बड़े शहरों में ₹80-₹100 में बिकने वाला #बनबूट (सुसुनिया) पलामू के खेतों में गलीचे की तरह बिछा होता है और जब उन प्राकृतिक गलीचों से हो कर कोई युवती गुजरती है, तो अनायास ही मन में ये गीत आने लगता है-
"खड़ो खेत में सुसुनिया गुईया....."
खैर साग की कहानी इतनी छोटी नहीं कि कोई इतनी आसानी से समेट सके। आप सभी अमांत्रित है अपने विचारों, सुझावों, साग के औषधीय गुणों और साग से बनने वाले व्यंजनों से हमें अवगत कराने के लिए।
धन्यवाद
@Jaya Dubey

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