#ठेठ_पलामू:- सब कुछ तो वही था
ख्वाबों का पिटारा लिए
चला जब घर से
हुआ दूर अपनों से
निकला जब चौखट से
परिवार को करते देख संघर्ष
सोचा मैं भी निभाऊं थोड़ा फर्ज
कुछ कंधे हल्के कर कर लूं
थोड़े कर्ज मैं भी उतार दूँ
बसाई नई दुनिया अपनी
कुछ छूटे दोस्त, कुछ नए बने
आया अपने गांव से दूर
आँखो मे बसाये कुछ सपने
पूरी हुई हर ख्वाहिशें
जो चाहा सब कुछ मिला
रुपया भी मिला, रुतबा भी मिला
मिली सारी जहां की शोहरते
चाहत हर पूरी हुई पर
कुछ छुटा सा क्यूँ लगता है
पहले होती थी हर जिद पूरी
आज सब कुछ तो है फिर
मुझे क्यूँ अधूरा सा लगता है?
पंख लगाके ऊंचे आसमान में
उड़ते उड़ते शायद कहीं भटक गया
बड़े शहरों के डिब्बे जैसे घरों में
यह पंछी कैद होके रह गया l
उन ऊंची इमारतों के कतारों मे
मेरे आँगन का सूरज कहा है?
फोन के एक बटन पर हर
मनपसन्द खाना हाजिर है
पर रोटी के उन कोर मे
माँ के हाथ का स्वाद कहाँ है?
दूनिया भर से लड़ लेता हूं
देशों विदेशों से बाते कर लेता हूं
पर माँ से सर टीकाकार
थोड़ी नोकझोंक कर लूं
इतनी फुर्सत मुझे कहाँ है?
सब कुछ तो फोन मे है
पूरी दुनिया मुठ्ठी मे है
फिर भी रिश्तों मे दूरी क्यूँ है
नेटवर्क तो सही है फिर भी
कनेक्शन अधूरी क्यूँ है?
दोस्तों से किए वो वादे अधूरे रह गए
उनके साथ छुट्टी मानना
उनकी शादियों में जाना
सब कहीं कहानी बनकर खो गए
जो सबसे खास थे, उनके शादी मे जाने को छुट्टी को दस बार सोचते हैं
अब तो फोन और फेसबुक से ही बधाई दे देते हैं
पहले जिन छुट्टियों में
जी भरकर उड़ाते थे
अब उन छुट्टियों को हम
एक एक करके उन्हें बचाते हैं
खोकर उन आदमियों की कतारों मे
मिला क्या उन खोखली चार दीवारों मे
पहचान बनाने को निकले घर से
उस भीड़ में टिमटिमाते चेहरों के बीच
मै भी तो भीड़ बन गया!!
अपने बीवी बच्चों के भविष्य
उज्ज्वल करने को हम जिन्हें छोड़ते हैं
जिनके हम बच्चे है
क्या उनके बारे में सोचते हैं?
चंद रुपये जोड़ने को
तुली पत्नियां घर तोड़ने को
थोड़ी पूंजी अपनी बनाने को
मै जहां छोड़ आया अपनों को?
सारी पूंजी तो मेरी वहीँ थी!!
मजबूत तो भाइयों के कंधे पर था
मजबूत तो माँ के स्नेह से था
मजबूत तो दोस्तों की दोस्ती मे था
यहा तो आकर बस मजदूर हुआ
यहा तो आकर और मजबूर हुआ
तिनका तिनका जोड़
घिस घिस के पाया जो कौडियों मे
पीछे देखा तो खुशियो का खजाना
तो वही छूट गया था
सब कुछ जुटाकर
अब मैं सोचता हूं
सब कुछ तो मेरा वहीँ था
सब कुछ तो........
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