#ठेठ_पलामू:- गाँव के होली
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घरे से भोरे भोरे ही वीडियो कॉल आया कि साल भर के दिन है तो सोचे बतिया ले न तो फिर उहाँ अमरीका में रात न हो जाता तो बात नहीं हो पाता। ऐसे ही सब से फ़ोनवे में दंड परनाम चल रहा था। भाई बताने लगा अबकि समत्त में लकड़ी के भी जुगाड़ नहीं हुआ था , खाली पूरा से ही काम चला आउ तो आउ अब भीड़ भी बहुत कम हो गया है। और इसमें भी जेतना लोग है उसमें गाने बजाने वाले तो एकदम ही न के बराबर बचे हैं। चाचा बताने लगे जो कि खुद मंडली में मुख्य #ढोलकिया रहते हैं कि पहिले जहाँ 200 से ऊपर भीड़ रहता था जे कि दरवाजे दरवाजा घूम घूम के गाता बजाता था उ अब 20 30 भी हो जाये तो बहुत है। और कहीं न कहीं उसके जिम्मेदार हमही लोग हैं। अब एक दु दिन के पर्व है तो के छुटी लेके घरे जाए। जहाँ है वहीं माना लेते हैं। और यही सब सोच के नहीं जाने वाला आदमी का संख्या जादे होते जा रहा है। और रिजल्ट देखिये गाँव मे होली ही फीका पड़ जा रहा है।
#ईमानदारी से हर कोई अपना दिल से पूछे केतनो टाउन में होली मना ले , बड़का बड़का बॉक्स में डीजे बजा के नाच ले लेकिन असली होली तो गाँव वाला ही होता है। और अगर आप कभी भी गाँव से जुड़े हुए हैं तो दिल से एकबार लगता जरूर होगा कि ई होली थोड़े है होली तो उ होता था जो हमलोग गाँव में खेलते थे।
रात के समत्त में बीच बीच मे एटम बम डाल के चुपचाप बढ़ बुजुर्ग के बमका देना से लेके होली नहीं गाने आये फिर भी बीच बीच में लय पकड़ने का कोशिश करना हो। सब का अलग ही आनंद रहता था। सुबह होते धुलेंधि के लिए सब लईकन पुरानो से पुरान कपड़ा निकाल के पहिन लेते थे। ओकर बाद समत्त के राख से टिका लगा के जोर से जयकारी होता था - "प्रेम से बोलिये सिया वर राम चंद्र कि जय"।और समझिए लईकन से लेके बड़हन तक के लिए ई ग्रीन सिग्नल रहता था कि अब बुरा न मानो होली है का लाइसेंस मिल गया है बदमाशी चालू रहे। अब कब ई राख के टिका लगाने से शुरू हुआ भीड़ घूमते घूमते गाँव मे कोरोना वायरस से भी तेजी से बढ़ जाता था पते नहीं चलता था। अब राख न मिले तो रस्ता में मिलल धुर बालू कादो नली से बाहर आने से लेके आदमी के उठा के नली में जाने तक का माहौल जब तक न बन जाये तब तक औपचारिक रूप से होली का शुभारंभ नहीं कहा जा सकता है। गंजी आउ गमछा पर घूमने वाले लोग के गंजी फाड़ना कौनो के पेंट में पीछे से पोंछ लगा देना ई सब मस्ती के पार्ट हुआ करता था।
घरे आके रंग वाला होली खेला जाता पर असली मजा आता शाम के नहा धो के जब अबीर वाला होली चलता तब। आलू के काट काट के उसमे #चोर लिखना जय श्री राम लिखना ई सब अलगे कलाकारी हुआ करता था। पर भीड़ में घुस के आउ सबसे बढ़िया साफ कुर्ता में चोर का मोहर लगाना अलगे उपलब्धि था। घरे-घरे जब होली गंवाता तो लईकन के पता रहता था कि किसके घर क्या खिलाया जाएगा। अब जहाँ #मसाला (पंचमेवा) तनी बढ़िया रहता था उहाँ आपको ढोलकिया के जस्ट बगल में 2 4 लईकन पहिले से हाज़िर रहता था। आउ मिलने के बाद अगर कहीं ज़्यादा सौंफ मिल जाये तो फिर जो फीडबैक मिलता था उ तो बस मन मे सोच लीजिये उसी में आनंद है।
अक्सर होली में गाँव में देखा जाता था कि किसीका गोतिया या आपस मे मन मुटाव रहे तो आज के दिन अब भूल के एक दूसरे से गला मिल के , प्रणाम कर के खत्म कर लेते थे। गांव के #हरवाह चरवाहा लोग के अलग से पीआई मिलता था कि साल भर के दिन में कुछ पी ले। पर अब यही दारू फैशन हो गया है और इसका परिणाम देखिये कि धीरे धीरे ये पंरपरा बस नियम पूर्ति के कगार पर है। आपसी द्वेष के चलते, बुरी आदतों के चलते और कहीं न कहीं हमलोग जैसे लोग जो 2 दिन के छुटी के चक्कर मे घर नहीं जा पाते हैं। यह पंरपरा भी विलुप्त होने के कगार पर है। जिसको बनाये रखने की जरूरत है। कोशिश करिये गांव में जाने का , साल भर में 2 -3 परब त्योहार तो होता ही है अगर आज नही जाएंगे तो अगला पीढ़ी को व्हाट्सएप में हैप्पी होली कर के ही होली मनाते पाएंगे। आपलोगों के लिए कुछ गाँव का वीडियो फ़ोटो दिखा रहे हैं, शायद देख के बचपन ईयाद आ जाये। होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं बढ़ बुढ़ के गोड़लागि आउ छोटकन के असीरबाद
मस्त रहे मस्ती में, समत्त जरल बा बस्ती में।
नोट- सम्पादन मंडली भी होली में व्यस्त हैं इसलिए वर्तनी में हुई गलती के लिए बुरा न मानो होली है।
@Anand keshaw


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