#ठेठ_पलामू:- करमा पूजा
--------------------------------------------------------------
भादो #एकादशी को गाया जाने वाला यह गीत #प्रकृति_पर्व_करमा का स्मरण कराता है। करमा #झारखंड का महत्वपूर्ण लोक पर्व है। कहते हैं कि हमारी संस्कृति और परंपरागत रीति-रिवाजों से ही समाज में हमारी पहचान होती है। आदिवासी समाज में #करमा पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसमें अटूट आस्था एवं विश्वास है। 'करमा' शब्द कर्म (परिश्रम) और करम (भाग्य) को दर्शाता है। मनुष्य नियमित रूम से अच्छे कर्म करे और भाग्य भी उसका साथ दे, इसी कामना के साथ यह पर्व मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर इस पर्व को भाई और बहन के स्नेह से भी जोड़ा जाता है। बहनें अपने भाइयों की सुख समृद्धि के लिए करम देव की पूजा करती हैं।
जिस तरह #सरहुल में अच्छी बारिश के लिए पूजा की जाती है, तो करमा में बीजों के अंकुरण और अच्छी फसल के लिए। तीज के दूसरे दिन से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। इस मौके पर एक बर्तन में बालू भरकर उसे बहुत ही कलात्मक तरीके से सजाया जाता है। पर्व शुरू होने के कुछ दिनों पहले उसमें जौ डाल दिए जाते हैं, इसे '#जावा' कहा जाता है। यही जावा बहनें अपने बालों में गूंथकर झूमती-नाचती हैं। बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। इनके भाई 'करम' वृक्ष की डाल लेकर घर के आंगन या खेतों में गाड़ते हैं। इसे वे प्रकृति के आराध्य देव मानकर पूजा करते हैं। पूजा समाप्त होने के बाद वे इस डाल को पूरे धार्मिक रीति से तालाब, पोखर, नदी आदि में विसर्जित कर देते हैं। इस अवसर पर विशेष गीत भी गाये जाते हैं-
” उठ उठ करमसेनी, पाही गिस विहान हो।
चल चल जाबो अब गंगा असनांद हो।"
करमा गीत में बड़े सुन्दर संबोधन का इस्तमाल होता है। एक दूसरे का नाम नहीं लेकर बड़े प्यार से किसी और शब्दों से सम्बोधन करते है। जैसे प्यार भरा संबोधन है - " गोलेंदा जोड़ा" इस गीत में इसका प्रयोग बड़े सुन्दर तरीके से किया गया है।
चलो नाचे जाबा रे गोलेंदा जोड़ा
करमा तिहार आये है, नाचे जाबो रे।
पहली मैं सुमिरौं सरस्वती माई रे
पाछू गौरी गणेश-रे गोलेंदा जोड़ा ...।।
करमा भाई के लिए बहन द्वारा किया जाने वाला पर्व है। ब्याहता लड़कियाँ करमा में नैहर चली जाती हैं, पर हर बार ऐसा नहीं हो पाता। वह अपनी ननदों के साथ ही करमा के अखड़ा में गाती-नाचती है। इस दौरान ननद-भाभी के बीच कई छेड़-छाड़ भी चलते रहते है जो लोकगीतों में देखी जाती है।
बांका रे बांका कुरथी,
भूंजे बइसल छोटकी ननद।
भूंजइते-भूंजइते ननद पोड़ी गेल
लाजे हूँ नाय जाय ससुर घार।
जाइते रे सिमर सिटिका
घुरइते फुलें भोभोकाल।
तोड़ी लिहा हो नन्देसूआ
ननदी के देबइ पहिराइ।
बांका रे बांका कुरथी...
यहाँ बहुत से पाठक होंगे जो आज करमा पूजा कर रही होंगी या बचपन मे करती होंगी। तो जल्दी से अपनी यादों को बताएँ। कैसे बचपन मे इसके लिये उत्साह रहता था? घर में डांट सुनने के बाद भी उपवास करना। भाई को बार-बार ये अहसास करवाना कि उसको कितना मानती हैं, देखो तो तुम्हारे लिए उपवास किये हैं। उसके बाद भाई का कहीं से भी करम का डाल खोजकर लाना।
छाया चित्र:-
Krishna Kanhaiya Dubey
4,127
People reached
513
Engagements

No comments:
Post a Comment