#पलामू_का_इतिहास : भाग 3
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मुग़लों के आने के बाद से टैक्स सिस्टम लागु होने लगा था, हिसाब किताब लिखा जाने लगा था. अंग्रेजों के समय से मालगुजारी, रैयत, जमींदारी इत्यादि का और ज्यादा लिखित विवरण उपलब्ध हैं जिनका संकलन ‘#गजेटियर_ऑफ़_बिहार’ में मिलता है. इसी कारण 16वीं सदी के बाद का विस्तृत लिखित इतिहास हमें उपलब्ध हो जाता है.
आदिवासी राजाओं और अन्य राजपूत रियासतों की कहानी भी 16वीं सदी से ही शुरू होती है. तब पलामू में ये #महत्वपूर्ण_राज_घराने थे- कोयल के किनारे चैनपुर, अमानत के किनारे मनातु, ओरंगा के किनारे चेरो राजवंश, मगध से सटे हुए नावा जयपुर, विश्रामपुर, लादीगढ़, छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे वर्तमान गढ़वा में रंका राजऔर नगर उंटारी.
इसी दरमियान रातू से संचालित छोटानागपुर के नागवंशी साम्राज्य से रामगढ अलग हुआ जिसके अन्दर वर्तमान हजारीबाग, चतरा और बोकारो इत्यदि थे. जी हाँ, तब रांची का आस्तित्व नहीं था, राजधानी रातू थी. जगन्नाथपुर धुर्वा में भी एक छोटी रियासत थी. रामगढ भी उस समय का महत्वपूर्ण केंद्र था ना कि हजारीबाग. इसीलिए बाद में जब गांधीजी का दक्षिण बिहार दौरा हुआ था तो उन्हें रामगढ में ही ठहराया गया था. अंग्रेजों और मुग़लों के समय में भी रामगढ में बड़ी सैनिक छावनी थी. छतीसगढ़ और ओड़िसा की तरफ की पडोसी रियासतें थी सरायकेला, खरसावाँ, डुमरिया इत्यादि.
तो ये सब 16वीं सदी की बात है, उसके बाद की विस्तृत जानकारी तो इतिहास की किताबों में उपलब्ध है और इन्टरनेट पर भी. #स्वर्गीय_हवलदारी_प्रसाद_गुप्ता की किताब में भी इस दौर का ही बृहत् वर्णन मिलता है. मगर हम कोशिश कर रहे हैं उसके पहले की स्थिति को समझने की. पलामू के इतिहास में इसे ‘अंधकारयुग’ कहा जा सकता है क्योंकि कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य हमें नहीं मिलता. इसीलिए अब हमें पडोसी साम्राज्यों के इतिहास से अप्रत्यक्ष साक्ष्य तलाशने की आवश्यकता है. आइये कोशिश करते हैं इनके सहारे 16वीं सदी के पहले के पलामू को समझने की.
हमने देखा कि लौहयुग में पलामू विशाल मगध साम्राज्य का ही हिस्सा था. मगध साम्राज्य की स्थापना बिम्बिसार ने की थी. बिम्बिसार को गौतम बुद्ध का समकालीन माना जाता है, इसके लिए साक्ष्य इस तरह उपलब्ध हैं कि नालंदा में बुद्ध के लिए बिम्बिसार ने एक सुन्दर वेणुवन का निर्माण करवाया था जो आज भी मौजूद है. बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने लिच्छवियों को हराकर वैशाली पर अधिकार कर लिया था. उसके बाद आये नंदवंश (424 BC) ने मगध साम्राज्य का विस्तार पूरब में बर्मा और दक्षिण में कर्णाटक तक किया. जाहिर है, उस समय पलामू में अगर कुछ छोटे बड़े राज्य रहे भी होंगे तो वे नंदवंश के अधीन ही हो गए होंगे. चाणक्य के मार्गदर्शन पर चन्द्रगुप्त मौर्य (321 BC) ने कमजोर पड़ते नंदवंश को हराकर ताकतवर क्षत्रिय मौर्य साम्राज्य की स्थापना की. सिकंदर का भारत विजय का सपना तब ही टुटा था, उसी समय भारत-यूनान संबंध प्रगाढ़ हुए थे जब सेल्यूकस की बेटी से चन्द्रगुप्त ने विवाह कर लिया था. यूनान के प्रख्यात विचारक अरस्तु, सुकरात प्लेटो आदि तब भारतीय ज्ञान विज्ञान से परिचित हुए थे, संस्कृतियों का आदान प्रदान हुआ था. व्यापार संबंध स्थापित हुए थे. मगर साथ ही पश्चिम की सभ्यताओं को भारतीय ऐश्वर्य और समृद्धि से इर्ष्या भी हुई होगी जिसके फलस्वरूप बाद में भारत पर विदेशी आक्रमणों का सिलसिला बढ़ता गया जिनका अंत इस्लामिक सल्तनत के रूप में हुआ. कुछ समय तक मगध पर यादव वंशी शुंग राजाओं ने राज किया. फिर आया भारत का स्वर्ण काल- गुप्त साम्राज्य. विक्रमादित्य ने शुरू किया विक्रम संवत, ईस्वी सन के 57 साल पहले ही. ग्रेगोरियन कैलेंडर तो सिर्फ सूर्य की गति से काल-निर्धारण करता है, इसी कारण इसमें कई अशुद्धियाँ है और हमें बीच में लीप ईयर की आवश्यकता पड़ती है. जबकि विक्रम संवत में चंद्रमा और सूर्य दोनों की सूक्ष्मतम स्थितियों का लेखा जोखा रखा जाता है, इसीलिए मौसम, ग्रहण इत्यादि की सटीक भविष्यवाणी इसमें संभव है. आप ठीक अंदाजा लगा रहे हैं, पाटलिपुत्र रूपी राजधानी में तब आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ रहते थे. कालिदास आदि ने संस्कृत के उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की. विक्रम बेताल के किस्से भी इसी दौर की दास्तान है.
गुप्त वंश के बाद कुछ समय तक इस क्षेत्र पर गुर्जर-प्रतिहार वंश का शाषण रहा और फिर कन्नौज के राजाओं का जिनमे हर्षवर्धन सबसे प्रसिद्ध था. कान्यकुब्ज (#कनौजिया) ब्राह्मणों का पलामू में आगमन इसी काल में हुआ. जबकि शाकद्वीपीय (सकलदीपी) ब्राह्मणों का आगमन शकों के आक्रमण के साथ माना जाता है. ‘शक’ सुमेरियाई थे, सुमेर की सभ्यता अपने ज्योतिष, चिकित्सा ज्ञान और सूर्य की उपासना के लिए प्रसिद्ध थी. उन्हें सबसे पहले वर्तमान औरंगाबाद के ‘देव’ में बसाया गया जहाँ उन्होंने सूर्यमंदिर का निर्माण कराया और #छठ_पूजा की शुरुआत की. मान्यता ये भी है कि भगवान् कृष्ण के चिकित्सा के लिए सर्वप्रथम वैद्य के रूप में उन्हें शाकद्वीप से गरुड़ पर बैठा के लाया गया था. मगध के अलावा तब बिहार में मिथिला और अंग महत्वपूर्ण महाजनपद थे. मिथिला में ब्राह्मण राजाओं का शाषण था, जिनकी राजधानी विदेह थी और शाषक को जनक कहा जाता था. अंग प्रदेश का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जहाँ दुर्योधन ने कर्ण को अंग प्रदेश का राजा घोषित किया था. अंगिका इनकी बोली थी और मुंगेर राजधानी. बाद में यह अंग से वंग प्रदेश हुआ और फिर बंगाल.
वंग प्रदेश पर पाल वंश ने 7वीं सदी में अपना साम्राज्य खड़ा किया. उन्होंने प्रतिहारों से मगध छीन लिया और बौद्धधर्म को राजधर्म घोषित कर दिया हिन्दू धर्म की जगह. संस्कृत की जगह प्राकृत और पाली भाषाओँ को प्राथमिकता दी जाने लगी. हालाँकि वैदिक काल के बाद संस्कृत की जगह अवहट्ट और फिर पाली ही लोकभाषा थी. अशोक के समय में भी शिलालेख और भोजपत्र पाली-प्राकृत भाषा में लिखे जाते थे. बीच में गुप्त काल में फिर से संस्कृत में कालिदास, बानभट्ट, पाणिनि, पतंजलि आदि ने ऐतिहासिक काव्यों-ग्रंथों की रचना की. मगर जैन-ग्रन्थ प्राकृत में और बौद्ध-ग्रन्थ पाली में लिखे गए, धम्मपद जिनमे सबसे प्रमुख है. प्राकृत से ही मगही भाषा उत्पन्न हुई. पाल वंश के समय ही विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों का निर्माण हुआ. पाल के बाद सेन वंश और फिर इस्लामिक शाषण. उसके बाद 16वीं सदी से यहाँ पलामू की रियासतें.
पाल वंश के समय पलामू की स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है. इस समय पलामू एक त्रिभुज के केंद्र में था जिसके तीन तरफ थे तीन विशाल साम्राज्य. पूरब की तरफ पाल वंश जिनका विस्तार बिहार से बंगाल तक था, पश्चिम में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य जिनका केंद्र उज्जैन और विस्तार अफगानिस्तान से काशी तक, दक्षिण में वाकाटक साम्राज्य जो दक्कन के पठारों पर फल फुल रहा था और गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तक फैला हुआ था. पुराणों में वर्णित दंडकारण्य दक्कन ही है. यहाँ बाद में राष्ट्रकूट और चोल राजाओं का प्रभाव रहा. इस त्रिभुज को इतिहासकार #कन्नौज_ट्रायंगल भी कहते हैं. हालाँकि उत्कल और कलिंग भी पलामू के पूरब-दक्षिण में थे. तीन विशाल साम्राज्य, तीन तरह की संस्कृतियां- एक तरफ बांग्ला का उदय बौद्ध धर्म के साथ, दूसरी तरफ क्षत्रिय हिन्दू और नीचे द्रविड़ों- मराठों से मेल खाती संस्कृति और केंद्र में पलामू. इस त्रिभुज का रोचक प्रभाव हम इस तरह समझते हैं- सोन-कोयल के मैदानी इलाके पाल साम्राज्य से प्रभावित हुए, छोटानागपुर से सटे आदिवासी बहुल भाग घने जंगलों के कारण कटे हुए रह गए, जबकि छत्तीसगढ़–ओड़िसा से लगे हुए भागों पर वाकाटक और कलिंग ने प्रभाव छोड़ा. एक बात पर ध्यान दें कि पलामू की सीमा रेखा उस समय कुछ और थी अब से बिलकुल अलग. अभी की सीमायें राजनैतिक हैं जबकि उस समय राज्यों की सीमाएं प्राकृतिक बंटवारे पर ज्यादा निर्भर थी. इस कांसेप्ट को हम आगे और विस्तार से समझते हैं बड़े साम्राज्यों के अधीन विकसित हो रहे छोटे रियासतों के आपसी संबधों के माध्यम से.
सोन-कोयल के संगम पर पलामू का सीमावर्ती ब्लाक है- हुसैनाबाद. नवाब हुसैन के पहले इसे जपला और पुरानों/ मगध शिलालेखों में इसे जपिला कहा जाता है. यहीं एक गाँव है- #कबरा_कला. यहाँ हाल ही में कुछ लोगों की घर बनाने के लिए खुदाई करते समय अन्दर से निकलते अजीबोगरीब वस्तुओं पर नजर पड़ी. अमुमन लोग डर जाते हैं कि शायद नीचे कोई कब्र हो या कोई भुतहा इतिहास. मगर जल्द ही लोगों को मिटटी के बर्तन और ईंटो से बने दीवार मिलने लगे. भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम सर्वेक्षण करने पहुंची और फिर बड़े पैमाने पर खुदाई आरम्भ हुआ. अभी तक ज्ञात जानकारी के आधार पर यहाँ पक्की इंटों से बने भवन के अवशेष मिले हैं जो अतीत में यहाँ किसी बड़े व्यापारिक नगर के आस्तित्व की तरफ इशारा करते हैं. मिट्टी के पके हुए बर्तन (मृदभांड), धातु की मूर्तियाँ और कुछ सिक्के भी मिले हैं. एक चौड़ी सड़क के भी अवशेष मिल रहे हैं जो शायद पाटलिपुत्र- उज्जैन- कलिंग को जोडती थी. जी हाँ कन्नौज ट्रायंगल के सन्दर्भ में इसे सोचिये. यानि पलामू इन तीन साम्राज्यों के लिए व्यापारिक मार्ग हुआ करता था. प्राप्त मुद्राओं के अलग अलग रूप भी इस अवधारणा को मजबूती देते हैं. पुरातत्वविज्ञानियों का कहना है कि यहाँ पहले एक विशाल बाजार भी लगता होगा और इसीलिए नगर चारदीवारियों और फाटकों से सुरक्षित रहा होगा. एक ऐसा भी बर्तन मिला है जिसका प्रयोग रोमन लोग शराब रखने के लिए करते थे. अर्थात यह नगर चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद का ही होगा जब युनान के रास्ते रोमन-भारत व्यापार संपन्न होते होंगे. शुंग, गुप्त, पाल, सेन इत्यादि काल के भी कुछ प्रमाण मिले हैं. हालाँकि पत्थर की एक विदरनी भी मिली है जो कि मूल रूप से नव-पाषाण काल में प्रयोग किया जाता था. तो क्या यह नगर उस समय भी था. जी नहीं. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जिस प्रकार गैस चूल्हा आ जाने के बाद भी कुछ लोग अभी भी लकड़ी के चूल्हे का उपयोग करते हैं इसी तरह धातुओं की खोज के बाद भी कुछ लोग पत्थर के बने औजारों का प्रयोग करते रहे होंगे. चुकि इस स्थान का विस्तृत अन्वेषण अभी बाकि है इसीलिए किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, इंतजार करते हैं कि अतीत के खजाने से निकले अवशेष पलामू के इतिहास को कौन सी नई दिशा देते हैं.
मगर जपला से जुडी एक और महत्वपूर्ण बात. यहाँ सोन नदी के ठीक दूसरे तरफ है प्रसिद्ध रोहतासगढ़. राजा हरिश्चंद्र के बेटे रोहिताश्व के नाम से इस स्थान को जोड़ा जाता है. बाद में यहाँ गौड़ वंश के राजाओं ने 700 AD तक राज किया, शशांक इस वंश का आखिरी राजा था. खरवार राजाओं ने 15वीं सदी तक इस गढ़ पे अधिकार रखा, शेरसाह सूरी ने उनसे यह किला छीन लिया और मुग़लों को हराकर अपना साम्राज्य स्थापित किया. सासाराम उसकी राजधानी थी. भारत के सबसे बड़े सड़क ग्रैंडट्रंक रोड का निर्माण भी शेरशाह ने ही कराया था. ध्यान देने वाली बात ये है कि रोहतास में जहाँ ठेठ भोजपुरी बोली जाती है वहीँ सोन नदी के इस तरफ जपला में ठेठ मगही का प्रभाव है. यह बात प्राकृतिक आधार पर सीमा निर्धारण वाले तर्क को मजबूत करता है. हालाँकि भोजपुरी और मगही दोनों भाषाएँ प्राकृत से ही उत्पन्न हुई हैं मराठी और बांग्ला की तरह. प्रशासनिक कार्यों के लिए कैथी लिपि (कायस्थी, लेखाकारों की लिपि) का प्रयोग मगही और भोजपुरी दोनों के लिए होता रहा अंग्रेजों के काल तक, बाद में इनका स्थान देवनागरी ने ले लिया. कैथी से ही मिलती जुलती लिपि थी- महाजनी. आज भी पलामू के पुराने साहूकार हिसाब किताब के लिए महाजनी लिपि का ही प्रयोग करते हैं.
सोन-कोयल के मैदानी इलाके से दक्षिण की तरफ बढ़ने पर पलामू का पठारी-जंगली इलाका शुरू होता है. और इधर की छोटी रियासतें थी छोटानागपुर के नागवंशी राज आदि. ‘आदिवासियों की भाषा’ और ‘प्राकृत’ के संगम से यहाँ ‘सादरी’ (नागपुरी) का विकास एक संपर्क भाषा के रूप में हुआ. बीच के क्षेत्रों पर कोल, धांगर, चेरो और मुंडा जातियों का अधिकार रहा. पिछले लेख में हम पलामू में मगही और नागपुरी भाषाओँ के भौगोलिक वितरण की चर्चा और इसके पीछे के सिद्धांत को समझ चुके हैं.
तो ये था लेखा जोखा पाषाण युग से लेकर मध्कालीन युग तक के पलामू का. अब आगे के आलेख में हम16वीं सदी से आरम्भ मुग़ल साम्राज्य, चेरो राज और राजपूत रियासतों के इतिहास को समझेंगे.
क्रमश: ...
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