#ठेठ_पलामू:- पलामू और मुग़ल-1
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झारखंड के इतिहास में पलामू का इतिहास सबसे गौरवशाली रहा है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली सल्तनत जिसका शासन लगभग 350 सालों तक रहा, वह भी कभी पलामू को नहीं जीत पाई। दिल्ली सल्तनत के बाद मुग़ल भी कभी पलामू को नहीं जीत पाएँ।
#शेरशाह ने भी बिहार और बंगाल को तो जीत लिया था, लेकिन कभी पलामू से कर वसूलने में सफल नहीं हो पाया था। अकबर ने 1585 ई में झारखंड को करदाता प्रदेश घोषित कर दिया था, परंतु फिर भी पलामू को कभी अकबर अपने अधीन नहीं कर पाया।
1538 ई में शेरशाह के सेनापति #ख्वास_खाँ से चेरो महाराजा '#महारथ चेरो' का भीषण युद्ध हुआ था, जिसके बाद मुग़लों ने लूट का ढेर सारा सामान प्राप्त किया था। उन्हें '#श्याम_सुंदर' नामक एक सफ़ेद हाथी प्राप्त हुआ था। जहांगीर से लेकर उसके उत्तराधिकारी शाहजहां ने भी लगातार पलामू पर अधिपत्य जमाने की कोशिशें की थी। राजा '#मेदिनी_राय' जहांगीर के समकालीन थे, उस समय यहाँ उनका ही शासन था, #शाहजहाँ के #पदशाहनामा में मुग़लों के पलामू अभियान का तिथिक्रम वर्णित है।
#औरंगजेब के समय में मुग़लों का संघर्ष मुख्य रूप से पलामू राज से ही होता था, चेरो राजा कभी किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करते थे। #लेस्लीगंज से #पोलपोल हो कर गुजरने वाली सड़क का निर्माण चेरो साम्राज्य पर हमला करने के लिए ही बनाया गया था। औरंगजेब भी कभी झुका नहीं पाया था, और औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़लों ने पलामू की तरफ कभी आँख उठा कर नहीं देखा।
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