#ठेठ_पलामू:- डाल्टनगंज में गाँधी जयंती
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आज #गांधीजी की 150 वीं जयंती है। सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस महामानव का स्मरण किया जा रहा है। एक संपन्न परिवार में जन्म लेकर और वकालत की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतवर्ष के आम नागरिकों के मनोविज्ञान को समझकर जो अविस्मरणीय नेतृत्व प्रदान किया। उसे एक छोटे से पोस्ट पर व्यक्त करना मुश्किल है।
बचपन में जब सोचने-समझने लायक हुआ। उम्र लगभग पाँच-छः वर्ष की रही होगी, तब सिंगरा के अपने घर में लगे चार-पाँच ब्लैक एंड व्हाइट चित्र आकर्षण का केन्द्र थे। जिसमें दो #महात्मा गांधी जी के चित्र भी थे। एक चित्र में वह किसी सभा के मंच पर बैठे हुए थे और दूसरे चित्र में चरखा चलाते हुए मुस्कुरा रहे थे। स्वाभाविक रुप से उनके प्रति जिज्ञासा होती थी। तब बाबा ने बताया था कि यह 'गांधी बाबा' है। इनके नेतृत्व में आजादी का आंदोलन चलाया गया था, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों से #आजादी मिली।
मेरे '#बाबा' गांधीजी के बहुत बड़े प्रशंसक थे।1927 में पलामू में आयोजित गांधीजी की सभा में वे भी सम्मिलित थें। जो उनकी यादगार स्मृतियों में एक था।वे अपने जीवन भर गांधीवादी मूल्यों का निर्वहन करते रहें।बाबा बताते थे कि - "उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारतीय राजनीति में गांधीजी का पदार्पण होता है। अपने संधर्ष के शुरूआती दिनों सन 1917 में ही वह पहली बार झारखण्ड में आए थें।उस समय इस क्षेत्र को #छोटा_नागपुर के नाम से जाना जाता था।"
#डाल्टनगंज में #बिन्देश्वरी पाठक और #भागवत पांडेय जी के नेतृत्व में सन 1919 में पलामू जिला कांग्रेस कमेटी की स्थापना की जाती है। सन1920 में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित किया गया। जहाँ पर ऐतिहासिक 'असहयोग आंदोलन' की कार्ययोजना बनी थी। जिसमें पलामू जिले के मुख्य प्रतिनिधियों मे बिंदेश्वरी पाठक, #देवनारायण मेहता, #हीरानंद ओझा, #दुर्गानंद ओझा, शेख #मोहम्मद हुसैन, #धनीसिंह खरबार जैसे अनेक प्रतिनिधि सम्मिलित थें।
इन्हीं दिनों पलामू में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हुई थी,बिंदेश्वरी पाठक जिसके प्रधानपाठक थे। उस समय कायस्थ विद्यालय के द्वारा भी गांधी जी के मिशन में सक्रियता दिखाई जा रही थी। जिसमें सर्वधर्म स्वभाव, अस्पृश्यता को दूर करना, खादी का प्रचार आदि महत्वपूर्ण था।जिसके फलस्वरूप पलामू जिले में गांधीवाद के विचारों की लहर तेज हो रही थी।
बहुत इंतज़ार के बाद 11 जनवरी 1927 को पलामू की धरती पर गांधीजी का आगमन हुआ। वह राजेन्द्र प्रसाद जी के साथ बनारस से ट्रेन के माध्यम से यहाँ पर आए थें। डाल्टनगंज के #शिवाजी मैदान पर उनकी विशाल सभा हुई। उस समय यातायात के सीमित साधन थे, फिर भी उस सभा में 20,000 से अधिक लोग सम्मिलित हुए। गांधीजी की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको सुनने के लिए 25-30 मील दूर से पैदल चलकर लोग यहाँ पहुंचे थें। इस सभा में उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद की मृत्यु और खादी पर अपना उद्बोधन दिया था।
उस सभा में गांधीजी ने पलामूवासियों को संबोधित करते हुए कहा था कि -" सन 25 में प्रवास पर निकला था। तब यहाँ आने का निश्चय किया था। परंतु तब मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं था, इसलिए नहीं आ सका था। आपके चंदे के लिए आपका आभार मानता हूँ। हम पर अस्पृश्यता का जो कलंक लगा हुआ है, उसे दूर करना चाहिए। मैं आशा रखता हूँ कि श्रद्धानंदजी के बलिदान से वह दूर हो जाएगा और उनके रुधिर से हम अपना मन पवित्र बना लें। कोई भी हिन्दू उनके खून का बदला लेने का विचार न करे। कोई मुसलमान उनके लिए गुप्त सहानुभूति न दिखाए। दूसरी बात खादी की, खादी के लिए बिहार ऐसा सूबा है कि वह सारे भारत को खादी पहुँचाने का बीड़ा उठा सकता है। मेरे नाम से बिना हस्ताक्षर का एक पर्चा आया है। मुझे लगता है यह ईसाइयों का होगा। इसमें लिखा है कि प्रत्येक भारतवासी बाइबिल पढ़े। इसमें ऐसी बात लिखी है, जो मेरे सपने में भी नहीं थी। जो भाई इन लोगों के लिए काम करते हैं, वे इन लोगों से कह दें कि इस पर्चे में अर्धसत्य है और अर्धसत्य तो झूठ से भी खराब है। अंत में फिर आपकी थैली के लिए अहसान मानता हूँ।""
इस सभा में गरीब-अमीर सभी लोग सम्मिलित थे।शहरी व्यापारी और दूरदराज से आए लोगों ने अपने सामर्थ्य के मुताबिक दो हजार से अधिक राशि दान किया था।उस दिन खादी की भी बहुत बिक्री हुई थी और उससे भी दो हजार रुपये से अधिक राशि एकत्र हुई थी।सभा के उपरांत वह डाल्टनगंज में स्थित #मारवाड़ी पुस्तकालय गए थें।आज भी वहाँ के विजिटर्स बुक में उनकी हस्तलिपि का मुआयना किया जा सकता है।जहाँ पुस्तकालय को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उसकी उन्नति के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त की थी।
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