#ठेठ_पलामू:- कर्णबेध संस्कार (कान छेदाई)
#एतवार मने खेले-कूदे के दिन आउ ओह दिन कोई टेंशन वाला बात कह दे, तो #एड़ी के लहर #कपार पर चहड़ जाता था। उस दिन अइसने कुछ हुआ। पूरा संसार के बच्चा लोग खेलने-कूदने और हाहा हीही करने में रमल था, तो हमनी के मुँह पर बारह बज रहा था। कारण था कि घरे पंडित जी आए थे और गुप्त मीटिंग में यह फैसला हुआ था कि काल्ह सब रेंगन के #कान_छेदवा देवल जाए। एही सुन के बढ़की और मंझली दीदी को छोड़ कर हमन सब के हाड़ काँप रहा था। हमन सब ईहे सोंच के एक-दूसरे के ढाँढस बँधा रहे थे कि कोई बात नहीं, तनिये सा न दुखायेगा फिर त #बाली, #टप्स, झुमका कुछु पहिन सकेंगे।
हम 35 सदस्यों वाले एक परिवार में उत्पात मचाते हुए बड़े हुए हैं। कान छेदवाने से बचने के लिए हमन सब रेंगन सोमार को 10 बजे के बदले 8 बजे ही स्कूल पहुँच कर गेट के बहरी खड़ा हो गए। घरे हमन के कान छेदवाने का तैयारी युद्ध स्तर पर चल रहा था। तभी अचानक से हम संझिला चाचा और एक फुआ को स्कूल आते देखे हमनी के त साँप सूंघ गया। दूनो मिल के हमनी के भेड़-बकरी की तरह हाँकते हुए वहाँ से ले जाने लगे। हम भी कोई कम नहीं थे लगे ऐने-ओने भागने, तभी चाचा हम दो मासूम बच्चियों को उठा के कंधे पे रख लिए और बाकि का हाथ फुआ जो पकड़ी सो घरहि आ कर छोड़ी।
अब बारी-बारी से सबको फुआ के कोरा में बैठाया जाता। साथ ही चार लोगों को हमारे हाथ-पैर पकड़ने का सौभाग्य भी प्राप्त हो गया और ऊ कसाई सोनार मशीन के जैसा टप-टप पहले हमारे बाएँ कान, फिर दाएँ कान उसके बाद नाक के बाएँ भाग में ताँबे के पतले तार से छेद कर गोल- गोल बाली पहना देता। कान छेदवाने समय हमन सब अपने सबसे प्रिय व्यक्ति का नाम ले-ले कर रोए, लेकिन कोई हमें उस आपदा से बचाने नहीं आया। बल्कि हमारा इकलौता दुलरुआ भाई ऊँचक-उँचक के हँस-हँस के ताली बजा रहा था। लेकिन उसकी हँसी भी रुलाई में तब्दील हो गई, जब उसका भी दायाँ कान छेद दिया गया। अब हमारा दुनिया से भरोसा उठ चुका था। इसलिए हम सब चुप हो गए और मने-मने पछता भी रहे थे, कि बिना दुखाये काहे रोये एतना। पहले ही ऑफर मान जाते तो कुछ तो मिल जाता। कुछ इस तरह हँसते-गाते हमारा कान छेदा गया।
लेकिन असली आफत तो अब शुरू होने वाला था। गुड़, मिठाई, चॉकलेट, मीठा, बिस्कुट सब चीज बंद हो गया। सभी लोग खाते और हमन #बाया तरी मुँह ताकते रहते। सुबेरे-सुबेरेे पतई पर बरसा शीत कान-नाक में लगाना और बासी पानी में हल्दी के #टूसा और कसैली रगड़ के कान पे चढ़ाना, हमन के दिनचर्या में शामिल हो गया। इस तरह जी-जान लगा कर भी हमन आपन कान-नाक पाक के भचभचाने से नहीं रोक पाए। कोई गलती से भी कान में ठेंक जाता या कभियो त झुठहुँ के कान पकड़ के भेम्हीयाना चालू कर देते, तो सबकोई दुलारना पुचकारना शुरु कर देता। सच बताए त बड़ी सुख मिलता था उस वक्त। कोई एक-दो महीने के बाद बुलकी काट कर नीम का सींक डाला गया, उसके कुछ दिनों बाद ही बाली और छुछिया पहनाया गया।
कर्णबेध संस्कार सनातन धर्म के 16 पवित्र संस्कारों में से एक है। यह नवाँ संस्कार है, जो बालक-बालिका के जन्म के विषम वर्षों जैसे 3-5-7 वें साल में संपन्न होता है। वैसे तो कान छेदवाने को लोग सौन्दर्य आभूषण से जोड़ कर देखते हैं, जो एक हद तक सही भी हैं, लेकिन इसका अपना एक वैज्ञानिक महत्व है। ऐसी मान्यता है कि कान में जो छेद किया जाता है, उससे जब सूर्य का प्रकाश गुजरता है, तो व्यक्ति तेजवान बनता है। कर्णबेध से श्रवण क्षमता अच्छी रहती है। मस्तिष्क में रक्त का संचार अच्छे से होता है। शास्त्र ने बिना कर्णबेध के व्यक्ति को श्राद्ध कर्म करने के लायक नहीं माना है।
गाँव में एक मान्यता है कि बिना कान छेदवाये केहू लड़का छप्पर-छान्हि पर नहीं चढ़ सकता है। खैर मान्यताएँ, परंपराएँ और वैज्ञानिक आधार एक तरफ और भारतीय महिलाओं का आभूषण प्रेम एक तरफ....। एक कौन कहे अब तो एक-एक कान में चार-चार छिद्र करवाती है लडकियाँ। उनके कर्णफूल ने कितने ही पुरुषों को कवि, शायर या उपन्यासकार बना दिया। कानों के झुमके और बालियों पर न जाने गीत बनाए और गुनगुनाए गए।
ये थी मेरे कान छेदाई की हृदय विदारक कहानी....आप भी अपने या अपनों के कर्णबेध से जुड़े अनुभवों से हमें परिचित कराएँ और इस आलेख को विस्तारित करें।
@Jaya Dubey
मझिआंव

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