#ठेठ_पलामू:- गुल
राँची पटना से आइल हमर ठेठ पलामू के भऊजी लोग नाम तो नहीं सुने होंगे इसका। हाँ, गुलाब मार्का #गुल का नाम जरूर सुने होंगे। अरे! वही तम्बाकू वाला गुल, जो दन्त मंजन जैसा यूज होता है और दाँत मसूड़ा सब के जला देता है। खैर जवन गुल का बात हम कर रहें हैं न ई भी जलाता ही है, पर पेट नहीं चूल्हा। अब पहिले हमनी के घरे ई गैस सिलेंडर चूल्हा तो रहता था नहीं कि बस फट से कान ऐंठे आउ टिप दिए #लाईटर आउ चूल्हा जलने लगा। उस समय चूल्हा रहता था, पर गैस वाला नहीं लकड़ी, कोइला, भूंसी वाला। जादे लोग जंगल के लकड़ी से काम चलाते थे, गोइठा से काम चलाते थे। पर अगर आपके घर में #कोइला चूल्हा पर खाना बनता है, मतलब आप उस समय के गाँव घर के स्टैंडर्ड परिवार कहलाते थे।
अब सब चूल्हा से थोड़ा- थोड़ा परिचय करवाते हैं। सबसे कॉमन रहता था- 'लकड़ी के #चूल्हा'। अगर लकड़ी सुखल रहा और 2-4 गोइठा रहा, आराम से जलाइये और जरूरत के हिसाब से आँच कम बेसी करते रहिए। दूसरा होता था- '#भूंसी वाला चूल्हा'। इसको तैयार करने के लिए चूल्हा के बीचे बोतल रख के भूंसी भरल जाता और एक बार जे ताव पकड़ता, तो फिर कुछ फिर टाइम तक रहता था और एक बार खत्म हुआ तो उसके बाद दुबारा जलाने का ऑप्शन नहीं रहता था। तीसरा था-'कोयला वाला चूल्हा'। इसको जलाने में इतना मेहनत कि पूछिये मत, 1-2 घण्टा पहिले से माटी के तेल, चिपरी, फोड़ल कोइला सब लेके बईठना पड़ता था। फिर आराम से स्टेप बाई स्टेप गोइठा जला के ओकर उपरे सुखल लकड़ी तब ऊपर से भर चूल्हा कोइला बोझ के छोड़ दिया जाता था। अब उ धीरे-धीरे पहिले #धुइंया खत्म करता, तब जा के ताव पकड़ता था।
उसी बीच में आंटा सान के, सब्जी काट के, चाउर धो के रेडी रखना पड़ता था। काहे कि ई चूल्हा के ताव भी कुछ देर तक रहता पर जब जाने लगता तो ऊपर से कोइला डाल सकते नहीं थे। काहे कि फिर पूरा घर कोइला के धुइंया से भर जाता। अब मान लीजिए कि सब आप रेडी करके रखें है आउ रोटी बनावत भर में कौनो #ललकोरी के लईका उठ के रोने लगा। जब तक ओने उ लईका फिर से चुप होता तब तक एने चूल्हो भी सूत जाता तो अलगे फजीहत।
एहि सब परिस्थिति के लिए कोयला के #चुरकुनी आउ गोबर। अरे ओही #गोबर जे कभी रस्ता में चले घड़ी गोड़ में लग जाए तो पीतराईन जैसा मुँह बनाने लगते हैं। उहे गोबर के साथ कोयला के चुरकुनी के सान के गोल-गोल गुल पारा जाता था। आउ सूखा के बोरे-बोरा भर के रखल रहता था। अईसन दिक्कत के अलावा जब भी जलावन के दिक्कत होता तो माई-चाची हाला नहीं करती थी कि अब कैसे खाना बनेगा गैस नहीं है । zomato से ऑर्डर कर के खाना मंगाते हैं, चाहे फलनवा के दोकान से चाउमीन मंगाते है। उ चुपचाप इसी से खाना बना लेती थी। हित नाथ के आईल गेल में चाय पानी के लिए भी सबसे आसान एहि रहता था। बस तनी सुन ढिबरी में से माटी के तेल निकाले, गोइठा में डाले और उपरे से 4 गो गुल डाल दिये। बस तुरंत चाय-पकौड़ी तैयार। इससे कोइला के चुरकुनी बर्बाद होने से भी बचता था और घरे के गोबर भी बचता था। मिला-जुला के 1 महीना के जलावन 2 महीना चल जाता था। तब जा के बाबूजी के पैसा बचता था आउ हमनी के स्कूल के फीस भराता था।
तो अबकी से गैस पर कढ़ाई चढ़ा के आउ मुँह बना के सेल्फी लेने के बाद जब माई चाची डांटे कि गैस बरबाद हो रहा है। तो हमर पास ई कहे से पहिले कि आपकी माँ तो बहुत डांटती है एक बार गुल के कहानी जरूर पढ़ लेना। ई जो तुम्हारे प्यारे #हसबैंड हैं न उहे गोबर के गुल के चलते पढ़ के #इंजीनियर बने हैं । गैस पर कढ़ाई चढ़ा के सेल्फी लेने से नहीं।
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