Saturday, January 2, 2021

सरस्वती पूजा

जब शाम को सड़क पर निकला, अचानक से तेज आवाज आई, सरस्वती माता की जय। मुड़ कर देखा, तो बच्चे #ट्रैक्टर में #सरस्वती जी की विशाल प्रतिमा ले कर जा रहे हैं, बस मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई और अपने बचपन की कहानी आँखों के सामने तैर गई।
पूजा की शुरुआत तो एक बैठक से होती है, लेकिन सरस्वती पूजा की योजना गली में खेलते-खेलते बनती है। सबसे पहले #साईकिल से बाजार जा कर #चंदा काटने वाले #रशीद(पैड) खरीदने से होती है, तय होता है कौन-कौन जाएगा और कैसा लेगा और कहाँ से लेगा? उस समय पैड का दाम 10₹ हुआ करता था, सब बच्चे आपस में चंदा इकठ्ठा कर, 2-3 पैड लेते थे, फिर एक कॉपी खरीदा जाता था, हिसाब रखने का, ये सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती थी, ये अक्सर उसे मिलता था, जो उम्र में बड़ा होता था। चूंकि सभी बच्चे तो स्कूल जाने वाले ही होते थे, इसलिए शाम का ही समय तय होता था चन्दा काटने का। चंदा उगाही करना कभी भी आसान काम नहीं होता है, आधे लोग नहीं देते थे जो किसी को जानते नहीं थे। मुहल्ले गली के पहचान वाले तो दे देते थे आसानी से, फिर धीरे-धीरे उस ग्रुप में कुछ बड़े बच्चे भी शामिल हो जाते थे, जिससे बस #ऑटो से भी चंदा कटने लगता था, तब फिर जा कर पैसों की कमी दूर हो जाती थी।
अब जब कुछ दिन बचता पूजा का, तब एक ग्रुप #डिस्कशन स्टार्ट होता कि कहाँ से मूर्ति खरीदी जाए और कितना बजट मूर्ति का होगा, फिर 2-4 को जिम्मेदारी जाती कि मूर्ति जा कर बुक कर दिया जाए। मूर्ति का कुल मूल्य 500-600 रुपये होता था, 300 एडवांस देना पड़ता था।
जब पूजा का 10 दिन बचता तब बारी पूजा स्थल के साफ-सफाई की आती थी। फिर प्रसाद की बात होती थी कि कैसे बनेगा कितना बनेगा, हलवाई ढूंढना, #हलवाई समझाता कि 10 किलो #बुनिया के लिए 5 किलो बेसन और 5 किलो चीनी, 5 लीटर तेल लगेगा, उसमें गाजर और बैर मिला दीजिएगा तो ढेरे हो जाएगा, फिर टेंट से 1 दो डेग और कुछ समान लाया जाता बुनिया के लिए, #गाजर खरीदा के आता, चूंकि #बैर का पेड़ बहुत था तो थोड़ा सँघर्ष के बाद बैर का जुगाड़ हो जाता है।
पूजा के एक दिन पहले से मुख्य आकर्षण और असली काम #पंडाल का स्टार्ट होता है, जो कि रात भर चलता है, सबसे पहले #बाँस का जुगाड़ करना और सबसे असली मुश्किल काम यही होता है, इसके बाद बांस गाड़ कर फ्रेम तैयार करने के बाद, हर घर से साड़ी इकट्ठा करना, #साड़ी तो मिल जाता था लेकिन हिदायत के बाद कि साड़ी फटना नहीं चाहिए, साड़ियों की छंटनी चालू होती कि कौन कहाँ लगेगा, सुंदर साड़ी सामने से दिखना चाहिए और फिर अगल-बगल से बोल्डर इकठ्ठा किया जाता, जिससे पहाड़ बनता। फिर रुआ और चुना डाल बर्फ भी बना दिया जाता, जो वाकई में खूबसूरत लगता था। #साउंड का भी जुगाड़ तब किया जाता था, जिसके घर #डेक साउंडबॉक्स होता था, वो ले आता था। आज तो dj का जमाना है।
अब पूजा के दिन पंडित जी को ढूंढना और उन्हें सही दक्षिणा पर मना लेना भी बहुत भारी काम होता है, सरस्वती पूजा सभी बच्चे दिल से करते हैं और विद्या कसम और सरस्वती माता की कसम से बड़ा कसम कोई लगता भी नहीं, सभी बच्चे अपने-अपने घर से किताब लाकर माता के चरणों मे अर्पित करते, जिसमें मुख्यतः मैथ और अंग्रेजी की किताबें ही होती थी, क्योंकि फेल होने का खतरा अधिकतर इन्हीं में लगता था। अब पूजा खत्म होने के बाद दो बच्चे टेबल लगा कर बैठ जाते थे प्रसाद बांटने के लिए।
सबसे आकर्षित करने वाला पल होता था, मूर्ति विसर्जन का, बच्चे नाचते, सरस्वती जय जय, सरस्वती माता की जय का उद्घोष करते अबीर गुलाल लगाते, नजदीकी जलस्रोत नदी-तालाब या डैम में जब जाते हैं। छात्र जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण त्योहार होता है। आप सभी को सरस्वती पूजा की शुभकामनाएँ।
आप लोग भी बताएँ कि आप सरस्वती पूजा कैसे मनाते थे या मनाते हैं?
@Sunny Shukla
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