#ठेठ_पलामू:- अँचार
तो अब आते हैं इसका शुरुआत से रूम में खाना बना के खा रहे थे तभी दोस्त बोला कि अँचार नहीं है क्या? अब है कि नहीं जवाब देने से पहले हम उल्टा पूछ दिए काहे खाना अच्छा नहीं बना है का ? अब 2- 3 आईटम रहते कोई अँचार माँग दे तो अब मन मे शक तो बुझायेगा न। तो बोलने लगा नहीं नही ऐसा बात नहीं है असल मे घर जैसा खाना बहुत दिन बाद मिला है तो अँचार मिल जाता तो और मजा आता खाने में। हम तुरंत डिब्बा निकाले उसको भी दिए थोड़ा सा खुद भी लिए। फिर अचानक खाते-खाते ईयाद पड़ा कि घरे अबकि अँचार लगा है कि नहीं। फोन लगाए बहिन से पूछे " आएँ मैडम अबकि अँचार लगल हाऊ कि ना घरे " तो बताने लगी कि " हं लगल हाऊ , माई तो पूरा दू दिन ओकरे में बिजी हलऊ। 6-7 किलो आम के अँचार लगल हाऊ। अभिये तो ढलाई पर से बोयाम के रख के आईल हियाउ।
वैसे लेम्बो, कटहर, चाहे गजरा-मुराई ,मिचाई के मिक्स अँचार माई खुद ही लगा लेती थी थोड़ा-थोड़ा कर के पर आम के अँचार एक ही बार ज्यादा लगाना रहता था तो ई काम दादी करती थी। गर्मी शुरू होइते बाबा से कह के एक्स्ट्रा मसाला आऊ #कड़ुआ तेल के बजट बन जाता था फिर बाजार से #आम मंगाया जाता। अब पहले काट के ओतना आम मिलता था नहीं इसलिए काटने का जिम्मा हमलोग के रहता था। बढका #पहसुल( बइठि) से काटते, नहीं तो फिर गाय- बैल के #कुटी काटने वाला #गड़ासा से। मसाला के पीसने का जिम्मा कोई चाची के दिया जाता । अब मसाला ओतना-ओतना #सिलऊट में जब पीसाता तब पूरा घर खाली मसाला से ही धमकते रहता था। मिचाई पीसने लगे तो #ढाँसी भी ओतने लगता। उधर दिन दिन भर अँगना में काटल आम के खटिया पर साड़ी बिछा के सुखाया जाता काहे कि बढ़िया से ना सूखे तो फिर #भकड़ न जाता अँचार। अब सुखाने समय मैनी-चिरई के भगाना के जिम्मा हमलोग का ही रहता था। एक तरफ आम सूखता तो दूसरा तरफ अलग से सीसा के #बोयाम धो के सूखने दे दिया जाता था। जिसमें दु तीन हर साल नया खरीदा हुआ रहता था बाकि पुरनका रहता था । उसमें भी सब के ढक्कन अलग-अलग रंग के, कौनो-कौनो के #ढक्कन के जगह दूसरा डब्बा के ढक्कन प्लास्टिक लगा के टाईट करना पड़ता था। और जब सब समान रेडी हो जाता तब #दादी आराम से उस दिन सब काम ख़त्म कर के #ढाबा पर बैईठ जाती। और सब अपन हाथ से ही नाप नाप के अंदाज से मिलाती। मिला के बोयाम के साइज के हिसाब से उसमे भर के रख दिया जाता। अब रोज-रोज उसको धूप में रख के पकाया जाता था। न धूप ज्यादा लगना चाहिए न कम अब इसका अंदाजा कइसे लगता था उ तो आज तक पता नहीं चला। पर दादी उ सब कर लेती थी, बीच- बीच में जा के बोयाम के हिला-डुला के पलटने का काम भी वही करती। इतना करने के बाद जा के अँचार बनता था । वइसे आम के अँचार पानी भात अँचार के अलावा हमको बहुत ज्यादा पसंद नहीं था भैया को ज्यादा पसंद था। गजरा, मुराई, #मिचाई के मिक्स अँचार भी भैया के ही पसन्द था । इसलिए जब भी घर आना होता माई अलगे से 2 डिब्बा लगा कि रख देती थी। एगो घरे आने पर खाने के लिए और एगो जाते समय साथे ले जाने के लिए । यही सब तो तरीक़ा हुआ करता था माई का उनके पास न होते हुए भी रहती थी ( बढ़ बेटा न है तो मानती उन्हीं को ज्यादा है)। हमको दाल भात के साथ लेम्बो के सादा वाला अँचार पसन्द था । लिखते-लिखते ईयाद पड़ा कि कभी लेम्बो के अँचार तो सच मे हमारा पसंदीदा आईटम हुआ करता था अभी भी है था इसलिए कहे काहे कि लास्ट टाईम खाये हुए केतना दिन हो गया है ई भी ईयाद नहीं है। खैर ज्यादा भावनाओं में बहने का जरूरत नहीं है यही सब के माध्यम से तो घर से दूर रह के भी हमलोग घर से जुड़े रहते हैं। अबकि घरे गए तो पक्का खायेंगे।
आनंद केशव ' देहाती'
@Anand Keshaw

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