#ठेठ_पलामू:- घोरानी
कौनो परेशानी घरे के #घोरानी
जाड़ होवे, गर्मी होवे,
चाहे बरसात के महीना
घरे सब्जी रहे कुछु न
तबो कोई दिक्कत नईखे
घरे के घोरानी हऊ न।
भोरे-भोरे कभी उठती तो देखती कि दादी #खुरपी लेके घोरानी के नीचे कुछु कर रही है। अब जानने के लिए पूछ देते कि - "का #रोपईत हे दादी" तो कहती जा टोक देल अब जामी तब न। अब रोज हमीन जा-जा के देखते कि जामा कि नहीं । जब जाम जाता तो उसको पानी देना, फिर जइसे-जइसे बढ़ता उसके आस-पास लकड़ी गाड़ देते कि कोई चढ़-उढ़ न जाए। तनी बड़ा हो जाता, तब उसके लिए #झांखी गाड़ल जाता। चाहे घोरानी पर चढ़ा दिया जाता और ऐसा नहीं था कि ई काम कोई विशेष सीज़न में होता था बल्कि ई काम सालों भर होते रहता था।
कभी घर में कोई सब्जी नहीं मिल रहा है, तो बस #बारी में #अंगना में घोरानी के पास चल जाइए कुछ-न-कुछ आपको मिलिए जाना था। जाड़ा के दिन में #सेम #लउका, #करइली, तो गरमी के दिन में #नेनुआ, #झिंगी, बोदी। #ख़क्सा, #रक्सा ई सब आईटम के तो एकमात्र जगह इहे सब रहता है। जे तो न रोपाता है आउ न मिलता है। अपने-अपने जाम जाता है।
जिनको समझ में न आया हो चाहे नहीं देखे होंगे, उनके लिए बता दें कि घोरानी मने पहिले बारी या घर आंगन में #चारदीवारी के जगह लकड़ी के खंभा से घेर दिया जाता था और उसके आर-पार न दिखे, इसलिए झाड़ी वाले पौधे, लर वाला आईटम सब लगाया जाता था।
गाँव के घर में जेतना महत्व #दुरा के है, उससे कहीं जादे बारी आउ घोरानी के है, तो इसमें कोई दु मत नहीं है। जइसे दीपावली में घर के साफ-सफाई जरूरी रहता है, उसी तरह से घरे के घोरानी के भी समय-समय पर रिपेयर करवाया जाता था। अगर गलती से कभी घरे जलावन के दिक्कत हो, तो इमरजेंसी में घोरानी का ही जुगाड़ काम आता था। दू चार गो झूरी तोड़ के काम चल जाता था।
अब ई बॉउंड्री के चक्कर में गांव में भी घोरानी कम हो गया है पर कहते हैं न जहाँ चाह, वहाँ राह। अबकी घरे गए तो देखे अभी ई सब्ज़ी के महंगाई में भी कम-से-कम 50 ठो लउका फरल है, उसके अलावे में अभियो नेनुआ, करईली, सेम भी पूरा तैयार है। अब हम खाएँ, तो सोचे आपलोग को भी याद दिला दें, ताकि आपलोग भी घरे के घोरानी के सब्जी खाएँ आऊ स्वस्थ रहें , मस्त रहें।

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