#ठेठ_पलामू:- कुइयाँ उड़ाहना
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आज के समय में पानी के जेतना दिक्कत हो गया है, ओतने सुविधा भी है। पर पहिले के समय में एकाध दु गो #चापाकल को छोड़ दिया जाए, तो #कुइयाँ ही पानी का एकमात्र साधन था। अब जइसे-जइसे बरसात के आने का टाइम होता था, ओइसे ही बेचारा कुइयाँ भी जवाब देने लगता था। यहाँ तक कि कुइयाँ का #सोई भी दिखने लगता था, और नीचे जमा गंदगी भी। अब एक बार बरसात हो जाए, तो फिर से भर जाए, इसलिए इसको साफ करने का यही सही समय रहता था। और इहे कुइयाँ साफ करने को हमलोग कुइयाँ #उड़ाहना कहते हैं ।
अब पलामू के गर्मी तो विश्व प्रसिद्ध है, इसमें कोई दु मत नहीं है, जिसके चलते कुइयाँ उड़ाहना हमीन लईकन के लिए कौनो पर्व त्योहार वाला फीलिंग दिलाता था। काहे कि इस दिन दु बार #पंप चलता था और नहाना फ्री रहता था। अब अईसन गर्मी में अगर पंप से नहाने मिल जाए, तो एकरो से बढ़िया कौनो उत्सव हो सकता था। पूरा नाच-नाच के नहाते थे पंप में । ओकर बाद चाचा रस्सी के सहारे घूंसते थे कुइयाँ में और #समुद्र_मंथन का कार्यक्रम स्टार्ट होता था। समुद्र मंथन काहे कहे समझ मे नहीं आया होगा न, अभी बताते हैं।
अब पानी भरते समय अगर रस्सी-बाल्टी गिर जाता था, तो उ तो #झगड़ से निकाल भी लेते थे। पर गिलास, चम्मच, लोटा, थरिया कौनो के पायल ई सब गिर जाता तो, उसको निकालने का अभी ही मौका रहता था। चाचा अंदर डुबकी लगा-लगा के कुछ-न-कुछ बाल्टी में डालते और हम रस्सी से खींचने वाला काम करते। जइसे-जइसे बाल्टी ऊपर आता दादी-चाची सब अगल बगल खड़ा रहते कि अबकी का निकलल। अब ई तो घरे के कुइयाँ था, इसलिए कम-से-कम देवता राक्षस वाला लड़ाई नहीं होता था। पर गलती से अगर गाँव के सामुदायिक कुइयाँ उड़ाहा जा रहा हो, तो #महाभारत का पूरा चांस रहता था। कौनो लोटा-गिलास पर कोई 2 आदमी दावेदारी ठोंक देता कि "ई तो हमर हलक तो अगला ई तो हमर हलक।"
मिला-जुला के किसी तरह सुलह कराया जाता था, पर जब भी दुनो में कभी और लड़ाई होता तो लोटा चोर का गाली बीच में आ जाना स्वाभाविक बात था। खैर ई तो हुआ कुइयाँ उड़ाहना, अब जैसे-जैसे पानी आता वैसे-वैसे अगल-बगल सब कुइयाँ में झाँक-झाँक के देखना कि किसमें केतना पानी भरा आम बात था। अब तो घरे-घर मोटर लगा रहता है, बोरिंग हो गया है ,तो कुइयाँ से पानी भरना भी सब भूल रहे हैं। पर अगर कुइयाँ को आप भी मिस कर रहे हैं और आपकी भी कुछ इससे जुड़ी यादें हैं, तो कमेंट में जरूर बताइएगा।
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