#ठेठ_पलामू:- झालमुड़ी (झालमुरही)
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चाहे कोई भी शहर हो, वहाँ सड़क के किनारे बिकने वाले ठेलों में कुछ विशेष और अनूठे स्वाद को कोई भूल नहीं पाता है। अगर शाम को कुछ हल्का खाने का मन हो, कुछ तीखा, कुछ चटपटा तो जुबान पर एक ही नाम आता है और वो है -'#झालमुड़ी'।
झालमुड़ी को स्नैक्स (नमकीन) का राजा कहा जाता है। मूलतः यह #बंगाली शब्द है। यह बंगाल की लोकप्रिय और बहुप्रचलित नमकीन (स्नैक्स) है। हमारे देश के अन्य राज्यों में इसे भेल, #भेलपुरी, #सेवपुरी, चुरमुरी जैसे कई नाम से जाना जाता है। इसका खट्टा-मीठा और चटपटा स्वाद, सीधे जीभ से होकर आत्मा को तृप्त कर देता है और व्यक्ति लंबे समय तक उसके स्वाद में खोया रहता है।
आज बहुराष्ट्रीय कंपनी के मार्केटिंग और लुभावने विज्ञापन के चलते बच्चे और युवा पीढ़ी इस पारंपरिक स्नैक्स को भूलकर '#कुरकुरे', '#लेज' और विभिन्न प्रकार के चिप्स के मायाजाल में फँसा हुआ है। जिसमें सामान से ज्यादा हवा भरा रहता है। सही कहा जाए तो जो मजा अपने आँखों के सामने 'झालमुड़ी' बनते हुए और फिर खाने में आता था, वो इस ठगबाज पैकेट में कहाँ मिलेगा।
पहले #डाल्टनगंज के हर चौक पर हर गली मुहल्ले में इसके ठेले दिखाई देते थे। गलियों में दिन में दो बार तो जरूर 'झालमुढ़ी-झालमुढ़ी' की आवाज सुनाई दे ही देती थी, लेकिन अब यह आवाज कभी सुनाई नहीं देता। बहुत खोजने के बाद कभी-कभार बस एक-दो ठेले वाले दिख जाते हैं। ऐसा लगता है कि आज के यो..यो.. जमाने के युवाओं ने तो, जैसे इसे नकार ही दिया है। मुझे अच्छी तरह याद है कि बचपन के दिनों में हम लोग तो 5₹ का झालमुड़ी भी दोस्तों के साथ मिल-बाँट कर खा लेते थे और उसमें जितना आनंद आता था, वो इन प्लास्टिक पैकेट के बासी और नकली स्नैक्स में आ ही नहीं सकता।
अब तो कभी मन भी कर जाए तो घर पर खुद ही मुढ़ी में, मूंगफली, प्याज, टमाटर काट कर उसमें अचार का मसाला मिला कर चाय के साथ आनंद ले लेते हैं। तो आइए, आज की शाम चाय के साथ 'झालमुढ़ी' का मजा लिया जाए, कसम से कुरकुरे से बहुत ज्यादा मजा देगा।
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