#ठेठ_पलामू:- फगुनहट
'फागुन' का नाम सुनते ही गुदगुदी-सी होती है, क्योंकि यह रंगों के साथ मस्ती और आनंद का महीना है।माघ महीने की कड़कड़ाती ठंड के बाद बहार के इस मौसम में मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति भी रंगीन और मदमस्त नजर आती है।
हमारी संस्कृति के अन्य त्योहारों के मुकाबले होली समानता और भाईचारे का सबसे बड़ा त्योहार है। यहाँ कोई बड़ा-छोटा नहीं, बल्कि सभी एक रंग में रंग जाते हैं। यहाँ पर अमीरी-गरीबी, दिखावा और फिजूलखर्ची नहीं है, बल्कि मस्ती और उल्लास के इस त्योहार में सभी कोई मिलजुल कर आनंद उठाते हैं।
आनंद के इस पर्व में गीत-संगीत का विशेष महत्व है। "आजु बिरिज में होरी रे रसिया....." तो कभी "आजु अवध में होरी खेले रघुवीरा.." और फिर "आजु सदाशिव खेलत होरी...।" यह गाते-बजाते हमारे यहाँ लोग अभी से नाल और झाल की धुन पर झूमते दिखाई पड़ते हैं।
अपना गाँव अब अपना नहीं, बल्कि कभी ब्रज, कभी अवध तो कभी कैलाश पर्वत बन जाता है। जहाँ ऐसे पारंपरिक गीत गाकर बूढ़े-जवान सभी मस्त होकर होली खेलते हैं। ऐसा लगता है कि राम, श्याम और शिव और सभी ईश्वर होली खेलने के लिए यहाँ उपस्थित हैं।
अब चाहे केतनो #खेसारी-फेसारी, कल्लू, अलबेला, रंगीला जैसे अनेकों गायक होली के स्वछंद वातावरण में अश्लील गीत गाएँ। अनपढ़ और नशेड़ी लोग उनके गीत बजाकर अपनी मूर्खता को प्रदर्शित करें। लेकिन हमारी गौरवशाली संस्कृति और परंपरा के सामने वे कहाँ टिकने वाले हैं।
वास्तव में फागुन का महीना हमें यह संदेश देता है कि इस मौसम में जिस तरह पेड़-पौधे अपने पुरानेपन को उतारकर फेंक देते हैं। नए पत्तियों के रूप में नए कपड़े पहन लेते हैं। प्रकृति,नए-नए सुंदर फूलों से सुशोभित हो जाती है। उसी प्रकार हमें भी अपने पुराने-बुरे विचारों को छोड़कर नए और अच्छे विचारों को अपनाना चाहिए। होली का यह त्योहार बुराइयों को खत्म करने और सभी भेदभाव को भुलाकर हम सभी को एक होने का संदेश देता है।
@Ajay Shukla

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