Saturday, January 9, 2021

मकईया रे तोहर गुण गवलो न जाला

 #ठेठ_पलामू:- मकईया रे तोहर गुण गवलो न जाला

#बरसात का मौसम कई मामलों में शुरु से ही बहुत अच्छा लगता है। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादल, चारो ओर हरियाली (मानो प्रकृति ने हरी चुनरी ओढ़ रखी हो), रात के सन्नाटे में झींगुरों की आवाज, गर्मागर्म चाय-पकौड़े और सबसे खास भुट्टों का आगमन। बरसात की शुरुआत के साथ ही ठेलों पर गर्मागर्म भुट्टे के पकने की सोंधी खुशबू मन को खुशी से भर देती है और जीभ उसे खाने को मचल उठता है,पर इसका असली आनंद तो बचपन में आता था।
मकई #बुनाने से लेकर #तोड़ाई तक में हमारी भागीदारी बढ़-चढ़कर होती थी। पिछले साल की मकई '#बिहन' के तौर पर संभाल कर रखी जाती थी और दो-चार लोग मिलकर उसका दाना निकालते (छोड़ाते) थे। खेत में नमी देखकर सूखा मौसम होते ही मकई बुनाने का काम शुरू हो जाता। '#हेंगा' पर चढ़ने का भी सुअवसर इसी दौरान मिलता, वैसी खुशी और वैसा उत्साह अब हवाई जहाज पर चढ़कर भी नहीं मिलता। बुआई के बाद बेसब्री से पौधों के उगने का इंतजार होता था कि कब थोड़ा बड़ा होगा, कोड़ाई और खरपतवार निकालने का काम होगा। पौधे के बड़े होने का यह इंतजार बड़ी भारी पड़ता था कि आखिर दाना कब आएगा और कब खाने को मिलेगा। कई मर्तबा सबसे नजर बचाकर बाल उघार के भी देखे हैं कि दाना आ रहा है कि नहीं।
दाना अइते कउआ, चिरई और #गिलहरी के आतंक शुरू हो जाता था। स्कूल से आकर,ओकर रखवाली के भी ड्यूटी लगता था। मकई के साथे-साथ खीरा और घरबोदिया भी लतर के साथ तैयार हो जाताथा।जेकर स्वाद एकदम निराला था। बिना छिलले खेते में तोड़ के वहीं खीरा खा लेते थे हम, क्योंकि न दवा के छिड़काव ओकरा पर होता था न कभी खाद के मदद लिया जाता । अब न तो उ स्वाद का खीरा मिलता है और न छोटका मकई। अब तो बिना स्वाद के संकर मकई के जमाना है, जेकरा पर नींबूओ रगड़ देला पर उ मजा नहीं आता है।
हाथ जले, चाहे करिया होखे, पर आग जला के मकई पकावे के जिम्मा भी हम खुदे उठाते थे। मद्धिम आंच पर सुनहरा पकल मकई में जे स्वाद था। उ तो सपना हो गया अब। एक बइठल में छः-सात गो खा जाते थे। फिर भले रात के खाना के छुट्टी हो जाता। बाल खा के अघा जाते तो पकला पर दाना निकाल के ओकर लावा 'भाड़' में(आधुनिक भाषा में #पाॅपकाॅर्न) भूंजाता था। घड़ा के आधा फोड़ के लकड़ी के चूल्हा पर घड़ा में बालू डाल के इ तैयार होता तो ओकर स्वाद बेजोड़ लगता था एकदम सोंधा सोंधा...। अब मकई के ढेरे '#चोंचला' आ गया है ..पाॅपकाॅर्न, #काॅर्नफ्लेक्स, दलिया, #बेबीकाॅर्न। पर केकरो में उ स्वाद आऊ उ मजा नहीं मिलता है।
सही कहा जाए तो मकई अब सिर्फ गरीबों का भोजन नहीं रहा, बल्कि पाँच सितारा होटलों में भी इससे कई प्रकार के व्यंजन बनते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाई जाती है साथ ही इसे काफी पौष्टिक और कम्पलीट फूड माना जाता है। इसे बनाना सरल-सहज है।चाहे शहर हो या गाँव,आज भी यह सभी जगह आसानी से उपलब्ध हो जाती है और जेब पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ता है। काश! बचपन फिर से लौट आता, आऊर कुछ होता चाहे नहीं, मकई के ऊहे स्वाद फिर मिल जाता "मकईया रे तोहर गुण गवलो न जाए..।"
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