Saturday, January 9, 2021

कजरी

 #ठेठ_पलामू:- कजरी

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सावन सबसे मनभावन महीना है।ये बारिश की फुहारों में भींगने और चारों तरफ फैली हरियाली को महसूस करने का मौसम है।यह सिर्फ मनुष्य ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, जीव-जंतु और कीट-पतंगों सभी के हँसने,खिलखिलाने, चहचहाने, #कजरी गीत गाने और गुनगुनाने का मौसम है।
सावन का महीना लोकगीतों की रानी 'कजरी' के नाम से भी जाना जाता है।'कजरी' सावन महीने में प्रकृति की सुंदरता से उत्पन्न हर्षोल्लास को शब्दों में पिरो कर गाया जाने वाला उत्तर भारत का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत है। इन गीतो में कभी प्रेम और मिलन के भाव तो कभी विरह के दर्द भरे भाव भी आपको मिल जाएंगे।प्रियतम के संयोग से उत्पन्न मीठे/नटखट भाव वाले स्वर में या किसी स्त्री का पति सावन के महीने में उसे छोड़कर कमाने के लिए कहीं परदेश चला जाता है तो विरह की उस घड़ी में भी कजरी गाया जाता है।
#मगही, #मैथिली, अवधी, ब्रज,बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी आदि भाषा क्षेत्र की इस प्रमुख लोकगीत की लोकप्रियता अब क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी खुशबू संपूर्ण भारतवर्ष में फैल चुकी है।बालीवुड में कजरी गीत कई रुप में नजर आते हैं। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘#न’ की टेक होती है।
कजरी लोकगीतों की शुरुआत कब और कहाँ से हुयी,यह शोध का विषय है।बहुत लोगों के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति से ही मानव, सावन के महीने में प्राकृतिक सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध हो गया होगा और अपने मन के भाव 'कजरी' के माध्यम से व्यक्त किया होगा।कुछ लोग इसकी शुरुआत द्वापर युग से मानते हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण के संयोग/वियोग के अवसर पर राधा और रुक्मिणी इसे गाती थीं।वैष्णव भक्त आज भी राधा-कृष्ण की लीलाओं का उल्लेख करते हुए कजरी गीत गाते हैं।
कुछ लोगों की मान्यता है कि कजरी की उत्पत्ति महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं। उनके अनुसार अपनी आठवीं संतान की रक्षा के लिए वासुदेव भादों की अंधेरी रात में नंद के घर कृष्ण को पहुंचाकर, जब नंदजा को ले आए थे और कंस ने जब नंदजा को पटकने की कोशिश की तब वह उसके हाथ से छूटकर सीधे विंध्याचल पर्वत में जाकर गिरी थीं। वही #नंदजा जी को विंध्याचली देवी के नाम से पूजा की जाती हैं। इनका एक नाम #कज्जला भी है। जिसे अपभ्रंश के पश्चात,उन्हें कजरी के नाम से जाना गया।आज भी मिर्जापुर जिले में स्थित माँ विन्धयवासिनी देवी के मंदिर में रात-रात भर कजरी गायी जाती है। वैसे कजरी के वर्ण्य-विषय काफ़ी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है।
आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व महान आयुर्वेदाचार्य महर्षि चरक के '#चरक_संहिता' में भी कजरी का उल्लेख है। जहाँ #महर्षि_चरक ने यौवन और सावन को एक दूसरे का पर्याय माना है।हिन्दी साहित्य में विद्यापति,मलिक मोहम्मद जायसी आदि शीर्षस्थ साहित्यकारों ने कजरी शैली में ढ़ेर सारे गीत लिखे हैं।सामान्यतः यह श्रृंगार रस प्रधान गीत है और ज्यादातर स्त्रियां ही इसे गाती हैं।सावन के महीने में रिमझिम फुहारों के बीच मन लुभाने वाले इस मौसम में सजीधजी स्त्रियाँ अपने सुंदर हाथों में मेंहदी लगाकर 'सावन-उत्सव' मनाती हैं।यह हमारी लोकपरंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है।
तो चलिए!सावन के इस सुहाने मौसम में कजरी गीत गाने या सुनने का भरपूर आनंद उठाए।अपने कमेंट के माध्यम से यह जरुर बताइएगा कि आपका पसंदीदा कजरी गीत कौन सा है।
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