#ठेठ_पलामू:- जय माँ गढ़देवी
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बचपन से #पलामू आते-जाते समय #गढ़वा शहर एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रुप में उभर कर सामने आता रहा है। समय के साथ यह जुड़ाव गहरा होता चला गया। आज यहाँ पर बहुत सारे मित्र और सगे-सम्बन्धी रहते हैं। धीरे -धीरे इस शहर के नामकरण और इतिहास के प्रति जिज्ञासा स्वाभाविक रुप से उत्पन्न होती चली गयी।क्योंकि उपलब्ध जानकारियों में इस शहर के इतिहास की बजाय बस इतना ही पता चलता है कि यह पलामू संभाग का प्रमुख जिला ही नहीं बल्कि महत्वपूर्ण शहरों में एक है। जो #झारखंड प्रदेश को #छत्तीसगढ़ और #उत्तर_प्रदेश से जोड़ती है।व्यापार के लिए यह बहुत प्राचीन नगर है। शायद इसीलिए इस शहर को एक प्रमुख व्यापारिक स्थल के रुप में जाना जाता है।
इस शहर के नामकरण के संदर्भ में 'गढ़' शब्द से बहुत गहरा सम्बन्ध है। #गढ़ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है - 'किला, दुर्ग, प्राचीर'। प्राचीन समय में प्रायःकिसी भी नगर के दो खण्ड हुआ करते थे। एक गढ़ क्षेत्र और दूसरा सामान्य क्षेत्र। सामान्यतः गढ़ क्षेत्र में राजा या जमींदार, उनके प्रमुख अधिकारी और कर्मचारी रहते थे। राजकार्य से सभी महत्वपूर्ण और अनिवार्य कार्यालय गढ़ परिसर में ही स्थित होते थे। शत्रुओं से सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर ऊँची और मजबूत दीवार बनायी जाती थी और सामान्यतःयह ऊँचे स्थान पर निर्मित होता था।
गढ़ शब्द का दूसरा अर्थ होता है- 'पर्वत'। देवी माँ को #पर्वत_पुत्री भी कहा जाता है। इसीलिए विभिन्न स्थलों में देवी माँ को #गढ़देवी के नाम से भी जाना जाता है। गढ़वा शहर में भी 'गढ़देवी मंदिर' आस्था का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। बहुत लोगों की मान्यता है कि गढ़देवी मंदिर स्थित होने के कारण ही इस शहर का नाम गढ़वा रखा गया होगा।
इतिहासकारों के अनुसार यह झारखंड का एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मन्दिर है। 1915 ई. के #गजेटियर सर्वे के मुताबिक गढ़वा के गढ़ परिसर में गढ़देवी मंदिर स्थित होने की जानकारी मिलती है। जहाँ नवरात्रि के दिन विशेष अर्चना पूजा की परम्परा का निर्वाह किया जाता था।एक किवदन्ती भी प्रचलित है कि गढ़वा गढ़ के एक राजा जिनका नाम #ठाकुर_अमरदयाल_सिंह था। जो निःसंतान होने के कारण परेशान थें। उड़ीसा राज्य के #देवीपुर नामक स्थान में उनकी ससुराल थी। वहाँ पर उनके शुभचिंतक ब्राह्मण देवताओं के अनुसार संतान प्राप्ति के लिए उन्हें, अपनी कुलदेवी गढ़देवी के मंदिर में विशेष अनुष्ठान की सलाह दी गयी। उन्होंने ब्राह्मण देवताओं की सलाह से गढ़देवी मंदिर में नवरात्रि के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित करके विधिपूर्वक अनुष्ठान किया था।उसके कुछ समय उपरांत ही उन्हें दो संतानें प्राप्त हुयी थी।
इसके बाद इस मंदिर की प्रसिद्धि तेजी से फैलती चली गयी और गढ़ परिसर के तमाम राजा उस परंपरा का लगातार पालन करते रहें। इस मंदिर की खासियत यह है कि प्रतिवर्ष यहाँ पर माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करके पूजा अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धालुओं के द्वारा यहाँ पर स्थित देवी माँ से मांगी गयी सभी मन्नतें पूरी हो जाती है।इसीलिए यह देवी माँ के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण आराधना स्थल के रुप में लोकप्रिय है। जहाँ पर गढ़वा,पलामू और झारखंड से ही नहीं बल्कि भारी मात्रा में पड़ोसी राज्य के श्रद्धालु भी यहाँ देवी माँ के दर्शन और आराधना के लिए पहुँचते हैं।
सम्माननीय पाठकगण के पास इस शहर के इतिहास और नामकरण के विषय में प्रामाणिक जानकारी हो तो ठेठ पलामू मंच के माध्यम से अवश्य शेयर करें जिससे गढ़वा शहर के इतिहास को जानकर हमारी नयी पीढ़ी लाभान्वित हो।
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