Saturday, January 9, 2021

गोदना (Tatto)

 #ठेठ_पलामू:- गोदना (Tatto)

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आज की युवा पीढ़ी में अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर अनोखे प्रकार के #टैटू बनवाने की परंपरा प्रचलन में है। टैटू बनवाने की यह परंपरा हमारे समाज में नई नहीं है, बल्कि प्राचीन काल से ही चली आ रही है। हाँ, ये बात अलग है कि पहले यह हमारी कला और परंपरा से जुड़ी हुई थी, पर अब इसने फैशन का रूप ले लिया है। फैशन बनने के कारण इसका नाम भी टैटू हो गया है, जिसे कि हम पहले 'गोदना' के नाम से जानते थे।
बचपन से ही हम सब देखते हैं कि गाँव के सभी बूढ़े आजी, चाची, माँ सभी ने #गोदना गुदवाया हुआ है। आजी के शरीर पर बड़े-बड़े गोदना गूदे हुए हैं। पहले सिर्फ वही महिलाएँ खलिहान में प्रवेश कर सकती थीं, जिन्होंने गोदना गुदवाया होता था, माना जाता है कि वो उन्हें बुरी नजरों से बचाता है। एेसा माना जाता है कि यह अनजाने में हुए पाप का नाश करता है। पाप के नाश के लिए ॐ, स्वास्तिक तथा देवी-देवताओं के चित्र बनाएं जाते थें। आदिवासी समाज में और अब आधुनिक समाज में भी यह खूबसूरती का प्रतीक माना जाता है। अदिवासी समाज में लोग गोदना के साथ कुछ गुणों को जोड़ते हैं; जैसे- अगर किसी के शरीर में बहुत सारे गोदना के चिन्ह हैं, तो वह व्यक्ति बहुत साहसी है।
पहले बबूल के कांटे को बालोर के रस में डुबो कर शरीर में उस कांटे को चुभाकर गोदना गुदवाया जाता था। वहीं अब आधुनिक युग में टैटू मशीन का प्रयोग किया जाता है। इस मशीन में अलग-अलग प्रकार की सुई लगाकर शरीर पर मनचाही आकृति बनवाई जाती है।
#बैगा जनजाति जो वर्धा जिली (बिलासपुर) में रहते हैं, वे गोदना को बहुत अहमियत देते हैं। गोदना प्रथा के #भिलवां रस, #मालवन वृक्ष रस या #रमतिला के काजल को तेल के घोल में फेंट कर उस लेप का इस्तेमाल किया जाता है। करीब आठ साल की बैगा लड़कियों के शरीर में गोदना करना प्रारम्भ होता है। शादी के बाद भी महिलाओं को गोदना गुदवाना जरूरी होता है। बैगा स्री गोदना गुदवाने को अपना धर्म मानती हैं। जो स्री अपने शरीर पर गोदना गुदवाती है, उसका मान समाज में बढ़ जाता है। वहीं ब्रिटिश फुटबालर डेविड बैकहम या फिल्म स्टार सैफ अली खान के लिए अपने शरीर पर गोदना गुदवाना एक फैशन हो सकता है, लेकिन झारखंड में बच्चों को पेट की बीमारियों से बचाने के लिए उनकी नाभि के आसपास गोदना गुदवाया जाता है।
बचपन से ही मुझे गोदना काफी आकर्षित करता था, परन्तु मुझे आर्मी में जाने का शौक था, तो युवा अवस्था तक मैं इससे वंचित रहा। भर्ती होने के बाद फिर से शौक जग गया, तो मैंने भी गुदवा लिया। वैसे तो आर्मी में मुश्किल है, परंतु मैं काफी बढ़िया स्पोर्ट्स मैन था इसलिए मुझे थोड़ी छूट मिल रखी थी, लेकिन यह आकर्षण खत्म होने वाला नहीं था, इसलिए मैं खुद ही एक टैटू आर्टिस्ट बन गया और रिटायरमेंट के बाद इसे अपना पेशा बना लिया और फिर कहते हैं न कि जब शौक पेशा बन जाए, तो इससे अच्छा कुछ नहीं होता।
@Bhaskar Dubey
Fitness coach and tatto artist
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