#ठेठ_पलामू:- मौसम की मार
यह समय था
फसलों के पकने का
फगुनहट की मस्ती में
चैता गीत गाने का।
यह समय था
हँसने खिलखिलाने का
फागुन के रंग से सराबोर होकर
मस्ती के गीत गुनगुनाने का।
जानें किसकी नजर गयी
हो रही बिन मौसम बरसात,
सिर पकड़े ,परेशान हैं किसान
किससे कहें,अपना अनकहा दुख
अपनी चिंता,अपनी परेशानी किसको बताए।
जिंदगी की कमजोर गाड़ी में
परिवार का असंतुलित बोझ
बेटी की शादी की चिन्ता
बच्चों का खाना-पढ़ना
घर में बेवक्त बूंदों का टपकना
आफत की इस बारिश में
आँखों में नमी के साथ
भीग चुकी है घर की दीवार।
बिन-मौसम बारिश में कहाँ कुछ बचा?
बुझ गयी है मेहनती आँखों की चमक
सपनें तो अंधेरे गर्त में दफन हो गए हैं
सब कुछ तो डूब गया इस प्रकोप में।
कौन सुनेगा,कौन पिघलेगा
इनकी पहाड़ सी दुख भरी कहानी सुनकर
कौन पोछेगा,कमजोर आँखों की आँसुओं को
कैसे करेगा किसान ,अगले मौसम तक का इंतजार
जब फिर जमीन पर इनके पाँव जमेंगे
जब फिर इनके छोटे-छोटे सपने सच होंगे।
सन्नी शुक्ला

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