#ठेठ_पलामू:- अबकि सूटर बिनाया कि नहीं
अभी न #चॉकलेट दे, तो #टेडी_बियर दे, #गुलाब दे जैसा खाली देवे वाला चलन है, पर पहिले ऐसा नहीं था। बल्कि सूटर ले, #मोफलर ले, #रुमाल ले वाला भी चलन था। पहिले के #गर्लफ्रैंड लोग भी घरे सब से छुपा-छुपा के मोफलर, सूटर बना-बना के अपन बॉयफ्रेंड के देती थी। हमको कभी नसीब नहीं हुआ अलग बात है। पर गर्लफ्रैंड के जेतना जदोजहद सब से छुपा के बीनने में होता था, उससे कहीं जादे लईका के घरे सबके कहाँ से आउ क्यों मिला ई समझाने में होता था। बहाना भी लगभग कॉमन ही होता था कि फलना दोस्त के बहिन से कह के बनवाए हैं, तो चीलना के दीदी के ऊन खरीद के दिए थे, तो उहे बिन दी थी। आउर एक बात ई जो स्पेशल वाला सूटर, मोफलर रहता था न उसमें अलगे से #कोडवर्ड भी रहता था, जिसको तो बस उहे समझ सकते हैं, जो बनाये हैं और जिसके लिए बनाए हैं।
जाड़ा के दिन आवे के पहिले से ही गाँव में ऊन बेचे वाला सब #साईकिल से घूमते रहता था। हर साल कुछ-न-कुछ अलगे डिज़ाइन के ऊन। अब जइसे कुछु खिलौना देख के लईकन उछलता है, वैसे ही ऊन देखते गाँव घर के लेडीज़ लोग। अब पहिले के महिला लोग के हॉबी भी तो रहता था- कढ़ाई, बुनाई, सिलाई। अब #कढ़ाई तो गिनल चुनल ही होता था, काहे कि अब केतना टेबुल क्लॉथ आउ पर्दा बने। सिलाई शौक-शौक के बात था, बहुत लोग के सिलाई बस शर्ट के टूटल बटन बदले तक ही सीमित था, पर बुनाई तो आस-पास के महिला से कॉम्पिटिशन वाला बात न था।
मने एक तरह से कहिए कि कवन लेडीज़ अपन मर्दाना बाल बच्चा के केतना मानती है, उ उसका नया-नया स्वेटर देख के पता लगाया जा सकता था। नया स्वेटर तो रहबे करता, उसमें हर बार नया-नया डिज़ाइन भी रहता था। एक-दूसरे से #डिजाइन सीखने का भी जबरदस्त कॉम्पिटिशन, छुपाने का भी ओतना ही कोशिश। तबो कोई केतनो करता, एक गाँव मे 4-5 ठो के एके कलर के स्वेटर मिल जाता तो 2-3 थो के डिज़ाइन भी। वैसे जाड़ा के दिन में इहे बहाने टाईम पास भी तो हो जाता था। चलते-फिरते, बोलते-चालते 2-4 कांटा बिनाई हो ही जाता था। इहाँ तक कि अगर कौनो के रेंगा होना रहता था, तो ओकर माई तो #मोज़ा, दस्ताना, टोपी, सुटर बिनबे करती, पर #मौसी आउ #फुआ लोग भी अपन घर से बिन-बिन के भेजती थी।
खैर ई बड़हन होने पर भी आते रहता था। काहे कि हमरो पास ढेरे दिन तक छोटकी फुआ आउ #छोटकी_मौसी के बिनल सुटर था, जे बडी मन से पहिनते थे। बनाने समय अगर गलती से लईका चाहे बड़हन घरे रह जाए, तो बार-बार उसको बुला के नपवाया जाता है कि- "अरे बाबू! सुन न तनी बहियाँ नाप तो ठीक होईल हाउ कि न, तब गला के डिजाइन उठायब।" स्टेप बाई स्टेप जइसे-जइसे बिनाता वैसे-वैसे ट्रायल भी चलते रहता। अब जिसको बीनने नहीं आता था, उ लोग वही फेरी वाला को पैसा देके बनवा लेते थे। ई सूटर और बिनाई के चक्कर मे केतना #मास्टरनी लोग बदनाम भी थी कि फलना मैडम पढ़ाती हैं जे बस ऊन कांटा लेके दिन भर घाम में बैठ के सूटर बिनइत रहती हैं।
हमको भी याद है दुनो भाई के #नारंगी रंग के एके डिजाइन के सूटर था, जे बड़ी दिन तक पहिनते थे। छोटकी मौसी बिन के दी थी। दुनो भाई के छाती पर बुलु रंग से दुगो मुर्गा बनल था(फ़ोटो में बीचे उहे पहिन के बइठे भी हैं)। बाद में भैया वाला छोट हो गया था, तो उसको भी हमहीं पहिने। चाचा के ससुरारी से शुरू-शुरू बिनल मोफलर भी मिला था। उसको भी हमहीं स्टाइल मार के यूज किए थे। सूटर बस जाड़ा से ही नहीं बचाता था, बल्कि सालों-साल तक परिवार में निशानी बनकर एक-दूसरे का याद दिलाने का काम भी करता रहता था। अब ई जैकेट के चक्कर में एकदम से खत्म ही हो गया है। पर जइसे फैशन घूम फिर के फिर से आता है उम्मीद है फिर कवनो सर सिनेमा वाला इसपे ध्यान देगा आउर फिर से घरे सूटर बिनाना चालू होगा। देखना पड़ेगा अभियो घरे एकाध गो पुरान सूटर होइबे करेगा कहीं-न-कहीं ट्रंक में बाँध के रखल होगा।
@Anand keshaw

No comments:
Post a Comment