#ठेठ_पलामू:- गढ़वा रोड
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हो सकता है कि आपके लिए '#गढ़वा_रोड' एक सामान्य-सा रेलवे #स्टेशन हो और देश में हजारों छोटे शहरों की तरह '#रेहला' एक छोटा-सा कस्बानुमा शहर। लेकिन अविभाजित #पलामू जिले में रहने वाले निवासियों के लिए यह जंक्शन उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। महँगे ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के दौर में यह विद्यार्थियों के लिए, रोजगार की तलाश करने वाले युवाओं और गरीब यात्रियों के लिए एक वरदान की तरह है। पलामू के सभी वर्ग के लोगों के दिल्ली, कलकत्ता, पटना, रांची और अमृतसर जैसे बड़े शहरों में जाने के लिए यह जंक्शन उनकी पहली पसंद है।
इस स्टेशन की लोकप्रियता और उपयोगिता का अंदाज़ा इसी आधार पर लगाया जा सकता है कि लोग 100-200 किमी की बस से लंबी यात्रा करके अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए इस जंक्शन से रेलयात्रा करना पसंद करते हैं। आप सभी इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि हिंसक बंदी के मामले में हमारा जिला सदैव प्रभावित रहा है। बरसात के समय सड़क परिवहन की दुर्दशा हो जाती है।तब प्रवासियों के लिए एकमात्र विकल्प रेल यात्रा ही रहती है।
मेरे पिता की कर्मभूमि #अम्बिकापुर है।गर्मी की छुट्टियों में हम अपने पैतृक निवास #सिंगरा जाते हैं। आमतौर से बस में अम्बिकापुर से #डाल्टनगंज की यात्रा करते समय भोर में नींद खुलने का एक बड़ा कारण होता था- बहुत सारे यात्रियों का इस विशेष स्टॉपेज पर उतरना। जिनको उतरना होता था वो तो अपने सामान के साथ उतरते ही थे।जिनको नहीं उतरना होता था वह भी अपने सामान की रखवाली करने उठ जाते थे।
'गढ़वा रोड' शायद यह रेहला नामक एक छोटे कस्बे में स्थित है, इसलिए इसे बहुत लोग रेहला के नाम से भी जानते हैं। इस स्टेशन से जुड़ी स्मृति मेरे लिए यादगार है, क्योंकि बचपन में मेरी पहली रेलयात्रा यहाँ से डाल्टनगंज तक हुई थी और वह भी फर्स्ट क्लास के डब्बे में। आज उस यादगार यात्रा की धुंधली स्मृतियों को आपके साथ शेयर कर रहा हूँ।
उस समय हम लोग अम्बिकापुर में रहते थे। वहाँ से बोहला(रामानुजगंज) और फिर कन्हर नदी पार करके(उस समय पुल का निर्माण नहीं हुआ था) गोदरमाना से दूसरी बस पकड़कर डाल्टनगंज जाना था। हमारे ननिहाल हरिनामांड में कोई महत्वपूर्ण मांगलिक कार्यक्रम था, इसलिए जाना बहुत जरूरी था। पिताजी कार्यालयी कार्यों में व्यस्त थे, इसलिए इस यात्रा में हम भाई-बहनों की नेतृत्वकर्ता हमारी माँ थी।
बोहला पहुँचने के पहले ही यात्रियों में सुगबुगाहट शुरु हो गयी थी कि कोई बहुत बड़ा बंदी है। उस पार(यानी पलामू में)बस-गाड़ी नहीं चल रही है।#कन्हर नदी पार करने के बाद यह बात सच साबित हुई कि कोई गाड़ी नहीं चल रही है सिवाय छिटपुट #टैम्पो के।आखिरकार एक टैम्पो मिल गया वह भी सिर्फ रेहला तक जाने के लिए तैयार हुआ। रेहला तक पहुँचने में रात के सात बज जाएँगे।उस जमाने में रात के समय गाड़ी में सफर करना बहुत जोखिम का काम था।
हम लोग टैम्पो से रेहला पहुँच गए। माँ ने फैसला कर लिया था कि वह डाल्टनगंज जाने के लिए रेलगाड़ी का उपयोग करेगी, क्योंकि आगे डाल्टनगंज के सफर से लिए सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय माध्यम था ट्रेन में सफर करना...। हम स्टेशन पर थे। हमेशा की तरह ट्रेन अपने निर्धारित समय से बहुत देर आई। जिस ट्रेन के डब्बे में कम भीड़-भाड़ थी, एक सज्जन व्यक्ति जो लेटे हुए थें, उन्होंने हमें देखकर बैठने के लिए थोड़ी जगह भी दे दी। एकदम साफ-सुथरा, रोशनी से जगमगाता और ठंडा डब्बा था। बाद में पता चला कि यह फर्स्ट क्लास का डिब्बा था। तकरीबन कुछ देर बाद हम लोग आराम से डाल्टनगंज पहुँच गए थे। यह मेरे जीवन की पहली रेल यात्रा थी जो गढ़वा रोड से डाल्टनगंज के बीच तय हुई थी।
आज उस सफर के कई वर्ष बीत गए हैं। बीच में बंदी हो या बरसात का मौसम, दिल्ली जाना हो या #कलकत्ता...गढ़वा रोड जंक्शन से सैकड़ों सफर किया, लेकिन उस पहले सफर की स्मृति हमेशा जीवंत रहेगी।
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