Saturday, January 2, 2021

बीसो

 आज के ही दिन आप सबका चहेता, आपको अपनी मिट्टी से जोड़ने वाला ये पेज 'ठेठ पलामू' अस्तित्व में आया था। हमें पलामू के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन और यहाँ के पकवानों से रूबरू करवाने के लिए।

आज इस पेज ने दो साल पूरे कर लिए हैं। कुछ लोगों के समूह, जिसमें संपादन मंडली, एडमिन, फ़ोटो हैं। साथ ही लिखने को उत्सुक लेखक और उन्हें इतना प्यार और सम्मान देने वाले पाठक मौजूद हैं। आज पेज को लाइक करने वाले लोगों की संख्या 5600 पहुँच चुकी है। बगैर आप सबों के सहयोग के हम इस मुकाम पर नहीं पहुँच सकते थे।
मजरूह सुल्तानपुरी की एक शायरी अर्ज है-
"हम अकेले ही चले थे जानिब-ए-मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।"
हम पेज के सभी सदस्यों, लेखकों और पाठकों के प्यार तथा सहयोग के लिए शुक्रगुज़ार हैं। आपका साथ आगे भी हमारे साथ यूँ ही बना रहे, इस कामना के साथ एक बार फिर से आपलोगों का धन्यवाद।
आपलोगों के समक्ष पेश है ठेठ पलामू का पहला पोस्ट ।
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14 अप्रैल यानि अम्बेडकर जयंती और बंगाली समाज का पोएला बैसाख।
परंतु पलामू के लिए एक अलग त्योहार '#बीसो' या '#सतुआन'।
तो, आइए आज आपको पलामू और सत्तू के संबंध से परिचित कराएँ और सत्तू खाने के अलग-अलग तौर-तरीकों से भी रूबरू कराएँ।
पलामू सदियों से अकाल ग्रस्त क्षेत्र रहा है। भूगोल में आपने पढ़ा होगा कि वृष्टि छाया प्रदेश यानि पहाड़ के दूसरी ओर का एरिया। पहाड़ से टकरा कर बादल दूसरी ओर ही बरस जाते हैं, पलामू के पड़ोसी जिले हरे-भरे और उपजाऊ हैं, मगर पलामू की धरती बंजर।
लंबे अकाल का परिणाम है- 'कोदो का भात' और 'सत्तू'। यहाँ गर्मी भी बहुत पड़ता है, तो पेट को ठंडा रखने के लिए भी सत्तू मशहूर है।
खेसारी, जौ, बूट का सत्तू और पानी और नमक मिर्च प्याज। इन सबके मेल से हो गया सबसे स्वादिष्ट व्यंजन तैयार और दिन भर की मजदूरी का जुगाड़। एक गिलास सत्तू पी लीजिए नमक जीरा प्याज के साथ। लू से बचाव का इससे बेहतर उपाय कुछ हो ही नहीं सकता।
जौ-गेंहू काटते टाइम अगर खेत में बनिहार के परास के पतई में सत्तू सान के प्रेम से खाते देख ले, तो समझिए उस टाइम तो 56 भोग खाना भी बेकार लगे। वैसे भी कौनो बाहर के जिला से मेहमान आए, तो स्पेशल आग्रह करके गोइठा वाला लिट्टी-चोखा तो घर में बनिए जाता है।
सफर में भी लोग गमछा में सतुआ और प्याज बाँध के निकलते थे, रास्ते में नदी किनारे ब्रेक लगाते थे और मूड बनाते हुए भोजपुरी निर्गुण गाते हुए तल्लीन होकर सतुआ सानते थे। ये भी एक कला है। आजकल के रेंगन को केतना पानी मिलाना है आऊ केतना नमक एकर आइडिया भी नहीं होता है और सबसे बढ़िया नाश्ता-खाना, चाहे ट्रेन में कहूँ दूर जाना हो तो फिर 'सतुआ भर के रोटी' जे कि अचार साथ भी खाए तो परम आनंद मिलता है।
सत्तू को चीनी या गुड़ मिला के भी खा सकते हैं। लड्डू बना के खा लीजिए, तो इसके सामने बेसन और मोतीचूर का लड्डू फेल हो जाएगा।
तो अपने-अपने बचपन की यादों में खो जाइए और न हो तो कचहरी पर जा के सत्तू दुकान से सतुआ लाइए आऊ मिजाज बना के खाइए।
[NOTE: अगर आप original पलामू के हैं, तो जरूर शेयर करें। जो duplicate होगा वही नहीं करेगा।]
बीसो की हार्दिक शुभकामनाएँ।
ठेठ पलामू परिवार
Image may contain: food, text that says "ठेठ पलामू"
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