#ठेठ_पलामू:- अषाढ़
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इस वर्ष पलामू में #आषाढ़ मास के आगमन के साथ ही समय पर #मानसून आ गया और बारिश भी शुरू हो गई। सही मायने में कहा जाए तो भीषण गर्मी के बाद बारिश का आना सिर्फ पानी का बरस जाना भर नहीं होता है, बल्कि यह लोगों में नए जीवन की आस जगाता है। इसी समय धरती की प्यास बुझती है और महीनों से तमतमाती धूप के बाद उसकी तपन शांत हो जाती है।
वर्षा ऋतु सबको अच्छा लगता है, पर एक व्यक्ति जिसे यह महीना प्राणों से भी प्यारा लगता है, वह है #किसान। किसान के लिए यह मौसम का पहला वरदान होता है। बारिश देखते ही उसके मायूस चेहरे खिल उठते हैं। उसके लिए बारिश अच्छी उपज का संकेत लेकर आता है। बारिश के आते ही उसके मन में अच्छे दिनों की उम्मीद जगनी शुरू हो जाती है। वे सभी अपने खेतों में रोपा-डोभा और जुताई करने में जुट जाते हैं। पेड़-पौधों और पत्तियों के साथ प्रकृति के सभी अंग में नवजीवन का संचार हो उठता है।
ज्येष्ठ महीने के बाद आषाढ़ महीने में उमड़ते-घुमड़ते और फिर बरसते बादलों को देखकर सिर्फ मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, कीट-फतिंगे सभी उत्साहित हो उठते हैं। बरसात के पानी से नदी-नालों और तालाब का सौंदर्य अपने उभार पर होता है। छतरी और बरसाती ओढ़कर छोटे बच्चों की स्कूल जाने की उत्सुकता और उनकी हँसी और खिलखिलाहट से सिर्फ जमीन ही नहीं, बल्कि हम सभी का मन हरा-भरा हो जाता है।
आषाढ़ के महीने में वर्षा ऋतु आते ही आसमान पर काले-काले बादलों की अटखेलियों को देख हम सब मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। तेज हवाओं के बीच बादल गरजने और बिजली चमकने से वातावरण में एक नए संगीत की सृष्टि होती है। प्रकृति के खूबसूरत रुप को देखकर पक्षी गीत गाते हैं, मोर नाचते हैं। इस सुहावने मौसम में मेढक के टर्र-टर्र की आवाज भी अच्छी लगती है। बारिश के बाद आकाश में #इन्द्रधनुष की सतरंगी छटा भी देखते ही मन मोह लेती है।
हिन्दी साहित्यकार और लोकगायकों ने इस महीने पर खूब लिखा है। लगभग अधिकांश रचनाकारों की रचना की नायिकाएँ, इस खूबसूरत महीने में अपने नायक के साथ नहीं होने पर दुख व्यक्त करती हुई दिखाई पड़ती हैं। मैथिल कोकिल #विद्यापति की यह पंक्तियाँ भी बहुत प्रसिद्ध है -"प्रीतम हमरो तेजने जाइ छी परदेशिया यौ, धरबै जोगनीक भेष...असाढ़ पुरि गेल बारह मास यौ, धरबै जोगनीक भेष...।"
#जायसी के 'पद्मावत' में रचित प्रसिद्ध बारहमासा आषाढ़ के महीने से ही शुरु होती है। जहाँ 'नागमती' इस महीने में अपने प्रियतम के पास नहीं होने पर दुखी होकर कहती है -"चढ़ा असाढ़, गगन घन गाजा। साजा विरह दुंद दल बाजा।।धूम साम, धौरे घन धाए। सेत धजा बग पाँति देखाए।। खड्ग बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुंद बान बरसहिं घन घोरा।।ओनई घटा आइ चहुँ फेरी। कंत !उबारु मदन हौं घेरी।।.."
भोजपुरी के #शेक्सपीयर' के रुप में प्रसिद्ध 'भिखारी ठाकुर' के प्रसिद्ध नाटक 'विदेशिया' में बारहमासा में अपने प्रियतम के वियोग में दुखी नायिका के स्वर किसी को भी उद्धेलित कर देता है -"आवेला आसाढ़ मास, लागेला अधिक आस, बरखा में पिया पास रहितन बटोहिया।" जबकि पुरबी के सम्राट के रुप में प्रसिद्ध 'महेन्दर मिश्र' की इन पंक्तियों को लोकगायक आज भी दोहराते हैं - "गरजत असाढ़ मास, पिया नहीं आयो पास..।"
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि असाढ़ का महीना बारह महीनों में सबसे लोकलुभावन है। इस महीने प्रकृति के नए रुप का दर्शन होता है। यह सबका पसंदीदा महीना है। इस महीने में सिर्फ मनुष्य ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी आनंद से विभोर हो उठते हैं। इसीलिए गीत-संगीत,साहित्य और संस्कृति में आषाढ़ महीने को विशेष महत्व दिया गया है।
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