#ठेठ_पलामू : ढिबरी
शाम के टाइम हो गईल हलक, बड़की दादी ललटेन आउ ढिबरी लेके बइठल हलक साफ करे ला। उहे जगह देखली कि फुआ के बेटा बड़ी ध्यान से एक जगह बइठ के उनका देखइत हलक, उ भी ऐसे जइसे कोई जादू चलइत होवे। आउर एकर में बेचारा के ग़लती का हलक, उ जन्मे लेले रहे ई लाइट बत्ती वाला जमाना में। ओकरा कभी मौके न मिलल रहे इसब देखे के। आउर जब अभी देखइत हलक तो एकदम नाया बुझाइत हलक कि कईसे ई ललटेन जे इतना जटिल देखाला उ खुल जाइत बा एक-एक करके। शुरू-शुरू में तो हमनियो बड़ी धेयान से देख हली कि कईसे ललटेन के सीसा का साँचा ओकरा बाएं दाएं जाये से तो रोकेला। आउ तो आउ ऊपर से ओकरा दबा के रखे वाला भी कइसे एतने जोर देव हलक कि सीसा न फुट हलक। (केतना बार तो सही से न बइठला पर एको मिनट के देर ना होइतक फूटे में)
दादी सब के अइसे भी सांझी बेरा रोज-रोज के इहे काम रह हलक। घर भर के ढिबरी ललटेन लेके एक जगह बईठ जइतन। सब के तेल बाती देख के फिर ललटेन के सीसा चमका के साफ कर हलन। उ टाइम सर्फ़ रह हलक पर गोइठा के राख से भी बड़ी बढिया चकाचक साफ हो जा हलक। एक दो बार लइके में कोशिश कइले हली तो एक तो हाथों कट गेल हलक ऊपर से ओइसन साफ न होइल हलक।बाद में फिर सिखते- सिखते आदत हो गईल तब दिक्कत न होइत हलक। ओइसे भी शाम के कवन लइका जल्दी लालटेन जरा के बइठत बा पढ़े ओकर बड़ाईयो बड़ी होव हलक। कै बार तो आसपास वाला भी उदाहरण देव हलन कि फलनवा के लइका के देखली छवे बजे से ललटेन जरा के बइठ गइल हलक आउर इसब का जनी कब बेरा होई पढ़े के ।
आउर ढिबरी के तो बाते अलग रहे, समझ लिहुँ कि उ जमाना के बजाज प्लेटिना रहे। सबसे ज्यादा माइलेज वाला आइटम। हर घर ढाबा में ओकरा रखे ला जगह फिक्स रह हलक। कहूँ लकड़ी के स्टैंड जईसन तो कहीं डोरा लटकावल रहईत हलक। मने अगर कोई कहतक कि उ घर के ढिबरी ले के आव तो आँख बंद कर के जायेला हलक आउर उ जगह से उठा के लेआवेला हलक। अब तो इन्वर्टर और बिजली वाला जमाना बा। आज के लेडिस तो #ढिबरी के बाती बिट दे वही बहुत बा बाती लगा के ढिबरी जलाना त बड़ी बड़का बात हो गईल।
आउ एगो बात बटम दबा के लाइट जलवे तो दादियो सिख गेल हलक तनी रउआ सब भी ढिबरी जलवे सिख लिहुँ।
Anand Keshaw

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