Saturday, January 9, 2021

बेटों की विदाई

 #ठेठ_पलामू:- बेटों की विदाई

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आज कई लोगों के घर मे माँ ने रात में ही चावल #फटक कर बोरी में बंद कर के रख दिया होगा। साथ मे अँचार, अदौरी, घर का पिसाया हुआ मसाला भी पैक हो गया होगा। आज दसहरा छुट्टी खत्म होने के बाद बेटा #राँची जो जाने वाला है। ये कहानी हमारे आपके घर की ही नहीं बल्कि लगभग अधिकतर घरों की है। भले #राँची की जगह कोई #पटना या #दिल्ली जा रहा हो।
3-4 दिनों तक घर भरा-भरा सा रहता है, बाहर के मेले से कहीं अच्छा घर मे लगा मेला लगता है। सब का साथ मे खाना , देर रात तक एक साथ बैठ के बात करना। बच्चे घर से बाहर रहते हैं इसलिए खासकर उनकी पसंद का खाना बनाना और फिर सुबह से लेकर दूसरे दिन के सुबह तक उसको ये कहकर खिलाना कि - " तनी कुन लान दियऊ का तोरा बेस लग हउ इहेला रहे देले हलियऊ " । एक अलग ही माहौल बना होता है। और शायद यही सब हमारे यहाँ के पर्व त्योहारों को खुद से जोड़ने पर मजबूर करती है।
दसहरा खत्म होने के दूसरे दिन से ही बच्चों के जाने के तैयारी होने लगती है। पूजा में उतना व्यस्त थके होने के बाद भी माँ का ध्यान लगा रहता है कि बेटा को क्या-क्या देना है? और वो घर का काम खत्म कर के जैसे ही समय मिले उसे जुटाने में लगी रहती है। कभी ये #कोठी से #पुरनका_चावल निकाल रही है तो कभी ठंढी बढ़ जाने के चलते थोड़ा अच्छा दिखने वाला कम्बल #बिछावन निकाल रही होती है। और बीच-बीच मे बेटे से आकर पूछती भी है - " आलू ले जइबे घरे के हउ पुरनका अभी नयका तो महँगा न मिलतऊ। तो तनी घरे वाला #बुट दे देले हिअउ फुला के खईहे न तो मन करे तो सब्जी भी बना लिहे। अँचार का चीज के ले जइबे #करील वाला बढ़िया बनल हउ दे देवईत हिअउ। "और न जाने क्या-क्या और लड़का बेचारा बस हाँ ना में ही जवाब दे रहा होता है।
उधर पापा थोड़ा हड़बड़ी में जल्दी-जल्दी का गुस्सा भी दिखा रहे होंगे। चाचा लोग पहले ही आसपास के लोगों के तरक्की का किस्सा कहानी सुना चुके थे कि " #फलनवा के लईका के उ चीज में नौकरी हो गेलइ, बहुत मेहनती हइयो हलइ, तो #चिलनवा के बेटी के एतना परसेंट आइल हई परीक्षा में, #पेपर_में_फ़ोटो आउ नाम भी छपल हलई। का जनी हमीन घर के कहिना नसीब होई।"
इन तमाम चीजों के बीच जो सबसे मुश्किल काम होता है वो माँ-बाप और बच्चों तीनों का खुद के भावनाओं को संभाल कर रखना। जहाँ लड़का चुप-चाप सबकी बात को सुन कर घर परिवार से दूर जाने के गम को छुपाते हुए इसबार और मेहनत का वादा खुद से कर रहा होता है। वहीं माँ अपने बेटे के दूर जाने की भावना को दबाये जल्दी-जल्दी सब कर के मन ही मन रो भी रही होती है और भगवान से प्रार्थना भी करते रहती है कि ये जो दूर भेजने का कष्ट वो कर रही है उसका फल अच्छा मिले और बेटा कुछ अच्छा कर के सबको जवाब दे। और बाप बस में बेटे को चढ़ाते तक खुद को इन तमाम भावनाओं से दूर दिखाने की कोशिश में जैसे उन्हें तो कोई फर्क ही नही पड़ रहा है। बस जल्दी करने का हल्ला किये जा रहे हैं। मन से इस उम्मीद के साथ कि बेटे को किसी चीज़ का दिक्कत नहीं होने दे रहे हैं तो बच्चा भी इसका परिणाम देगा। जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होगा और नाम पेपर में आये चाहे न आये पर बेटा आगे चलकर काम जरूर आयेगा।
अब ये सिर्फ बेटों तक ही नहीं #बेटियां भी बाहर जाने लगीं है। भले #डेरा का जगह #हॉस्टल ने ले लिया हो। हम विद्यार्थी जीवन से आगे बढ़कर #नौकरी करने लगे हो पर घर से आते समय आने वाला माँ का प्यार, बाप का विश्वास, और चाचा-बाबा के द्वारा अगल-बगल के लोगों के सफलता की कहानी वही है। और हम बच्चे भी भारी मन के साथ आगे कुछ और अच्छा करने के वादे और नई जिम्मेदारी के साथ घर से विदा हो रहे हैं।
फ़ोटो:- Sunny Shukla
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